Wednesday, March 30, 2011

बाकी है!

उलझे हुए कुछ पल, उलझी हुई हैं यादें भी,
उलझी हुई सी यादों की तस्वीर अब भी बाकी है,
अपने मरासिम की, कुछ याद अब भी बाकी है !

Monday, March 28, 2011

एक और शाम!

एक और शाम तुम मेरे नाम कर दो ना,
मेरे गुनाहों का अब तो हिसाब कर दो ना,
तुम्ही से मैंने ज़िन्दगी को समझा है,
मेरी भी ज़िन्दगी में कुछ और रंग भर दो ना,
इन्ही रंगों में एक रंग तुम मिलाना अपना,
और उसी रंग में मुझे फिर एक बार रंग दो ना!
जो एक पल सुकून का अब तुमसे मिल जाये,
उस एक पल में मेरी खुशियाँ फिर से सिमट जाए,
वो एक और पल सीर्फ मेरे नाम कर दो ना!!
एक और शाम तुम मेरे नाम कर दो ना!

खुदा बचता है!

कुछ  सवालों के जवाब क्यूँ मिलते नहीं,
हमें खुशियाँ बेहिसाब क्यूँ मिलती नहीं,
खुशियों को तोल मोल के देता है ये खुदा,
गम के हिसाब मांगो तो बचता है ये खुदा,

तन्हाई

औरों के ग़मों को अपनाते रहें हम,
तनहा ज़िन्दगी यूँही बसर करते रहे हम,
ना जाने किसकी नज़र खुशियों को लग गयी,
अपनों के बीच भी मैं, अकेली रह गयी,
मेरी शामों को तन्हाईयों ने क़ैद कर लिया,
मेरे ज़िन्दगी को रुसवाइयों ने यूँ जकड लिया,
के जैसे अपनी ही सूरत बेगानी हो जाये,
के जैसे ख्वाबों की मूरत धुंधली पड़ जाये!

तेरे सामने

खुद की ख़ुशी तो सोची नहीं तेरे सामने,
तुझको खुदा ही समझा, उस रब के सामने,
मेरी वफ़ा का सिला तूने इस तरह दिया,
तू छोड़ चला मुझको मेरे मेरे घर के सामने,
जब याद में मैंने कभी कोई ख़त लिखे,
तूने टूकड़े उसके किये मेरे ही सामने,
मुझको सजा मिली है ये इश्क की जनाब,
मेरे खुदा के ज़ुल्म का कोई नहीं हिसाब,
दिल दर्द और अब तो सह नहीं सकता,
तेरे इश्क के साथ और रह नहीं सकता,
मुझे बक्श दे मेरे खुदा तू और कुछ न कर,
ज़ख्मों को छेड़ कर नासूर अब न कर,
गर हो सके तो मुझको चैन-ओ-करार  दे दे,
एक दिप तू जला दे मेरे जनाज़े के सामने,

मेरी पलकों में जो यादें हैं वो किसके नाम लिखूं!

तेरी नज़रें जो करती हैं, वो एक सवाल मुझसे,
तेरी नज़रों को समझूँ मैं और आज कुछ लिखूं,
तेरे, मैं इन सवालों का आज जवाब कुछ लिखूं,
तुझे उम्मीद है मुझसे, मुझे उम्मीद किस्मत से,
तेरी उम्मीद पे उतरूं या किस्मत आजमाऊं मैं,
मुझे भी ज़िन्दगी ने एक दिन पैगाम भेजा था,
मेरी भी सुबहें रोशन थी मेरे भी शाम रंगीं थे,
मेरी कसमें भी सच्ची थी, मेरे एहसास सच्चे हैं,
तुम्हारी कल्पनाएँ हैं,  मेरी यादें भी सच्ची हैं,
वो कसमें भूल जाऊं मैं, और फिर मुस्कुराऊं मैं,
ये मुमकिन हो नहीं सकता, के सबकुछ भूल जाऊं मैं!!!

Friday, March 25, 2011

बाबूजी

ज़िन्दगी की कुछ सच्चाई कभी बदल नहीं सकती! ये हम सब जानते हैं, लेकिन उन् सच्चाइयों को स्वीकार करना शायद इतना आसन नहीं होता!


जाते जाते, मुझसे आपने एक बात कही थी,
कहा था आपने मैं लौट के आऊंगा एक दिन,
और फिर खेल खिलोने लेके आऊंगा एक दिन,
आप जब साथ थे तो कितना सब अच्छा था,
माँ भी खुश थी और सारा जग सच्चा था,
कितनी रातों को आप जागे थे हमारे लिए,
कितने ही साल छोड़ आए थे आप हमारे लिए,
गुज़रे दिन और गुज़र गयीं शामें भी,
अब तो लगता है जैसे गुज़र गयीं सदियाँ ही,
आपकी याद हमें चैन से जीने नहीं देती,
दीदी बन बैठी है भाई, देख के पीर पराई,
अपने जीवन को अब तक वो भूल चुकी है,
खुशियों से जैसे सारे नाते वो तोड़ चुकी है,
आपका चेहरा अब भी याद आता है हमें,
आज भी पिछले पहर खूब रुलाता है हमें,
न गुडिया और न खिलोनो की अब चाहत ही बची है,
सूनी आँखों में बस आपकी तस्वीर थमी है,
काश एक बार फिर से आप बाबूजी आ जाएं,
सूने घर को हमारे आप फिर से रोशन कर जाएं,

Thursday, March 24, 2011

यूँही एक बार रास्ते में जब हम तुमसे मिले थे,
कुछ बेबाक सी थी मैं, होश में तुम भी कहाँ थे,
बातों बातों में तुमने वो साज़ छेड दिए थे,
जिनको सुनने की  बेकरारी में मैंने दिन गिने थे,
सामने तुम थे, और नज़रें मेरी नीची थी,
चाँद हाथों में था, क़दमों में ज़मीन फैली थी,
तुमने कुछ पूछा था मुझसे यूँही घबराते हुए,
मैंने भी शायद कुछ कहा यूँही शर्माते हुए,
चलते चलते यूँही रास्ते में एक मोड़ आ गया,
साथ वो चार पल का जाने क्यूँ मुझसे खो गया,
तेरी वो एक झलक दिल में यूँही बसाए हुए,
तनहा बैठे हैं उन्ही यादों को हम सजाये हुए,
बस..... एक और बार तुमसे मुलाक़ात हो जाये,
दरमियाँ अपने जो फासला हैं वो ख़ाक हो जाये,

सैलाब

आज दिल भरा भरा सा है, जैसे कुछ होने वाला है,
दिल को रोका तो बहोत पर छलकनेवाला है,
कल जो कहते थे तेरे आँख के मोतियों को संभालेंगे हम,
उनके ही दामन पे आज सैलाब आनेवाला है!


प्यार सच्चा है, आजमा के तो देखिये,
हम आपके हैं, पास आ के तो देखिये,
कह गए लोग, हम कर के दिखाएँगे,
आपके लिए तो जान भी लुटा जायेंगे,
तक़ल्लुफ़ छोडिये, जरा नज़रें तो मिलाइए,
अजी हाथ क्या चीज़ है, हमें जान से लगाइए,
हो गए दिन बहोत आपसे दूर रहते,
चाँद तारे भी थकते नहीं ताने कसते,


ख्याल

अपने ही कुछ ख्याल को अलफ़ाज़ देकर,
अपनी ही सोच लेकर, अपने ही गीत गाकर,
कभी मुस्कुराकर, कभी शरमाकर,
कभी बातो बातो में यूँही उलझकर,
कितनी ही बार तेरी चौखट तक जाकर,
तेज़ होती हुई उन् साँसों को रोककर,
ख्यालों में कई बार तुम्हे अपना मानकर,
शिकवे भी किये हैं, और शिकायतें भी,
उलझे भी हैं हम और रूठे भी,
मनाया है तुमने कई बार मुझे,
कई बार किये हैं फूलों के बौछार भी,
कभी ज़िन्दगी के  मोड़ पर जब अकेली रह गयी,
तुम्हारी बाँहों का सहारा मिला, और मैं पूरी हो गयी,
ऐसी ही जाने कितनी यादें समेटकर,
ऐसी ही जाने कितनी यादें समेटकर.............
इश्क है क्या ये हम जानते नहीं,
तुमको शायद हम पहचानते नहीं,
ज़िन्दगी के इस तनहा रास्ते में,
किसी को हम खुदा मानते नहीं!
24.3.11