Wednesday, August 31, 2011

क्या करते

अपने मुक़द्दर से शिकवा क्या करते , अपनों से मिले जख्म किसी से क्या कहते 
यादों  की खुशबू भी अब तो जाने लगी, तेरे आने का इंतज़ार अब और  क्या करते!

अनजान

वक़्त जो बदला कुछ ऐसा हुआ असर, अपने ही चेहरे से हम अनजान हो गए

याद बाकी है

हाँ, चेहरे पे एक उदासी है,
नज़रें आज भी प्यासी है,
उनके चेहरे को देखे अब तो ज़माना हो गया,
पर याद धुंधली ही सही, बाकी है!

Monday, August 29, 2011

आखिर इनकी उम्र जो निश्चित है!


मेरे तुम्हारे बीच एक रिश्ता...
फिर बना दूसरा रिश्ता
और वो अपनी उम्र निश्चित करके आया था,
बस यूँही.....
बातों बातों में....
दो चार कदम बस साथ चलके...
एक दूसरे का हाथ थाम हाथों में
जाने कितने ख्वाब देख डाले 
जाने कितने धागे बुन डाले,
ख्यालों के सफ़र में तुमको अपने  साथ पाया…कई दफा..
मेरे होठों  को  तुमने  मुस्कान  दिए ..कई दफा…
वो धागे पक्के  हैं, वो खवाब सच्चे हैं…
इसी  एक सोच  के सहारे  गुज़रती  रही  ज़िन्दगी ..
भरोसा  था तुम्हे  खुदपे …मुझे  तुमपे ,
भरोसे  झूठे  थे ………………
सारे  धागे कच्चे  थे,
सारे ख्वाब झूठे थे,
तुमने अपनी मजबूरियां  गिनवाई 
मैंने  अपने रास्ते  बदले ,
पर  इन  रास्तों  पर चलके भी …..
तुम्हारे ही  साथ की  तलाश  रही…
जानती  थी , जानती हूँ  के रिश्तों  को तो  खत्म  होना  ही था,
आखिर  इनकी  उम्र जो  निश्चित है!
तेरी नज़रों में, मेरी कीमत क्या है,
औरों को छोड़, ये बता, मेरी ज़रुरत क्या है,
तुझसे शिकवा भी नहीं कर सकती, और शिकायत भी नहीं,
तेरे लब पे भूले से आए नाम मेरा, ऐसी अपनी किस्मत भी नहीं!

Thursday, August 4, 2011

रिश्ता

चलो एक ख़ास रिश्ता बनाते हैं,
आओ एक दूसरे में खो जाते हैं,
बेखबर दुनियां से दूर,
कहीं अपना आशियाँ बनाते हैं,
ले चलो मुझे बादलों के पार,
परियों के देस में हम बस जाते हैं
हर सपना सच हो जाए, ये दुआ करते हैं,
खुशियों की खुशबूएं बिखेरकर,
मुस्कुराते, खिलखिलाते, बस यूँही जीते जाते हैं!
चलो एक ख़ास रिश्ता बनाते हैं,
आओ एक दूसरे में खो जाते हैं,

ज़ख्मों को ताज़ा कर दिया

आज तुमने वो बात छेड़कर, मेरे ज़ख्मों को  ताज़ा कर दिया!

सबकुछ भुला के, माज़ी को कहीं दूर पीछे छोड़ बहुत आगे  निकल आई थी मैं, (ऐसा मुझे महसूस होता था) पर शायद मैं गलत थी, मैं तो अब भी उसी रास्ते पर चल रही हूँ, उसी मोड़ पर खड़ी हूँ, जहाँ गुज़रे वक़्त के साए मुझे जंजीरों से बांधे हुए हैं, वो एक बेवफाई का बोझ अपने कांधे पे उठाए मैं अब भी चल रही हूँ, बेवफाई….हाँ जो उसने की, और इलज़ाम मेरे सर आया, क्यूँ ….क्यूँ मैंने बर्दाश्त किया वो सब? किसके लिये? अपने लिये? तुम्हारे लिये? या उसके लिये?? क्यूँ किये मैंने वो समझौते जो मैं नहीं करना चाहती थी, जिसको करके आज भी पछता रही हूँ!! क्यूँ बर्दाश्त किया मैंने उसके झूठी शख्सियत को, नफरत करती थी मैं......................... नफरत करती थी मैं उससे कल….और आज भी प्यार नहीं करती! फिर क्या है हमारे बीच??????????….उससे एक रिश्ता जो समाज ने बनाया, और सब ने अपनाया लेकिन मेरे लिये आज भी स्वीकार करना उतना ही मुश्किल है जितना कल था! क्या होगा इस रिश्ते का अंजाम! हर रिश्ता जो शुरू होता है वो एक दिन ख़त्म हो जाता है, क्या ऐसा मेरे साथ भी होगा!

अपने सवालों में उलझी, उनके जवाबों को ढूंढती, चलती जा रही हूँ, एक अकेली सुनसान राह पे, जहाँ कोई नहीं, कोई भी नहीं मेरे साथ, बिलकुल अकेली!! बस एक साया है, हाँ वो एक साया जो मेरे माज़ी ने मुझे सौगात में दी थी!


मेरे तुम्हारे रिश्ते का अब अंजाम क्या  होगा,
आगाज़ ऐसा है तो जाने अंजाम क्या होगा!


उस पार ले चलो!

मेरी मुश्किलों बस  कम कर दो,
मेरी उलझनों को बेरंग कर दो,
थामो हाथ मेरा, उस पार ले चलो,
दुनियाँ ने गम दिए बहुत हैं,
दुनियाँ के गम सहे बहुत हैं,
अब इन ग़मों को बेअसर कर दो
थामो हाथ मेरा, उस पार ले चलो!