Wednesday, September 28, 2011

हर असर धीरे धीरे कम हो जाता है

हर  ज़ख्म  भर  जाता  है  एक  दिन , शायद  ये  सच  ही  कहा  है किसी  ने!!
कल  तुम  गए  तो  ऐसा  लगा  के  सांसें  कम   सी  हो  गयी  हैं , ज़िन्दगी  जैसे  ख़त्म  होने  को है , जैसे  हवाओं  ने रुख  मोड़  लिया  है, जैसे  वक़्त  थम  सा  गया  है,  पर  नहीं ! ऐसा  कुछ  हुआ  नहीं  था , ये  बस  वो  एहसास  थे,  मेरे  ज़हन  जो में  बस  गए  थे , तुम्हारे  जाने  की  वजह  से , तुम  नहीं  थे , और  इस बात  को  स्वीकार  करना मेरे लिए  मुश्किल  ही  नहीं  नामुमकिन  सा  था ! तुम्हारा जाना  मेरे अस्तित्व के  अधूरेपन  का  एहसास दिला रहा  था , मैं  टूट गयी  थी , बिलकुल  अकेली  हो  गयी  थी , सब  थे  आसपास  लेकिन  मुझे  कोई  नज़र  ही नहीं  आता  था , बस  दिन  रात  ….तुम्हारा  ख्याल , तुम्हारी  ही  शक्ल  दिन  रात  मेरे ज़हन  में  घुमती  फिरती थी ! ऐसा  लगता  था  मानो  मेरी  सांसें  तो  चल  रही हैं …पर  मैं  जिंदा  नहीं  हूँ ! मेरी  नज़रें  एक  टक जाने  क्या देखा करती  थी !  घंटों , पहरों ,  कई  दिनों  तक …बस  एक  सोच  उन   सांसों  के  साथ  मेरे  ज़हन  में  दौड़ा करती थी ! कैसे ! आखिर  कैसे  तुमने  मुझे  ऐसा  समझा  होगा !! क्या  सोचकर  तुमने  वो बात  कही ! मुझपर इलज़ाम लगते वक़्त क्या तुम्हारे होंठ काँपे  नहीं! क्या कुछ भी याद नहीं रहा होगा तुम्हे उस वक़्त!! वो पल वो लम्हें जो हमने साथ गुज़ारे थे, तुम मुझसे कहा करते थे, हम एक दुसरे के बिना बिलकुल अधूरे हो जाएँगे! हाँ ये तो हुआ पर सीर्फ मेरे साथ! बहोत गहरी चोट  पहोचाई   मुझे  और  इस  बार  मैं  बिलकुल  टूट  गयी!!
पर  आसपास  सबकुछ  तो  वैसा  ही  था , जैसे  तुम्हारे  सामने  हुआ करता  था , हवाएं  बहती  थी  और  अपना असर  अब भी  छोड़  जाती  थी , चिड़ियों  की  चहचहाहट  वादियों में अब गूँज रही थी, वक़्त  भी  अपनी  रफ़्तार पकडे  चल  रहा  था , और एक  वक़्त  आया  जब  इन आँखों  ने  भी  थक  कर  आंसू  बहाना  छोड़  दिया !
सब  बदल  जाता  है  न ! सारे  लम्हे  कहीं  अन्दर  घुसकर बैठ  जाते  हैं ! जब  ये  ज़ख़्म  ताज़ा  होते   हैं  तो  हर वक़्त  हर  पहर  अपने होने  का  एहसास  दिलाते  हैं ! पर  धीरे  धीरे  ये  दम  तोड़  देते   हैं ! और  दिल  के किसी कोने  में  उसकी  लाश  पड़ी  होती  है ! जिसे  वक़्त  के  साथ  हम  खुद  दफ्न कर  देते  हैं !............. कुछ  भी  नहीं बचता ..कुछ  भी नहीं …
जब  ज़िन्दगी  ख़त्म  होती  है  तो  अपने पीछे यादें  छोड़ जाती है ! जिन्हें हम  अपने  अन्दर  सहेजकर  रखते  हैं ! और  जब  कभी  दिल  चाहे  उसे  खोलकर देख  लेते  हैं ! यादों  की  पोटली  को  खोलो  तो  कभी  आँखें  नम   होती हैं  और कभी  होठों  पर  हल्की सी मुस्कान  बिखर  जाती  है !
लेकिन  जब  रिश्ता  ख़त्म  होता  है ……..तो  कुछ  भी  नहीं बचता  कुछ  भी  नहीं ! वहां सीर्फ  मौत  होती  है, रिश्ते की मौत!

Monday, September 19, 2011

कुछ तो साथ ले जाता, मुझे छोड़ के जानेवाला

मेरे  सिरहाने  जो  ये  तुम्हारी  यादें  पड़ी  हैं  न ,
इन्हें  अब  ले  जाओ ,
देर रात  तक  नींद  नहीं  आती  है ,
एक  एक  करके  हर  एक  याद  तुम्हारी ,
मुझको  मुझसे  ही  दूर  ले  जाते  हैं
रोकती  हूँ , संभालती  हूँ ,
खुद  में  रोज़  लड़ती  हूँ ,
पर  इनपे  कुछ  भी  असर  होता  नहीं ,
हर  शाम  जब  सूरज  कहीं  दूर  क्षितिज  में  डूब  रहा  होता है ,
मैं  उसके  दर्द  को  महसूस  करती  हूँ ,
वो  डूबना  उसका ,  महज़  छुपना  नहीं …
कई  बार  चाह  खुद  को  समझाऊं , के  वो  तो
आँख  मिचोली  खेल  रहा  है  इस  चाँद  के  साथ !
के  वो  तो  गया  है  कल  फिर से  आने  के  लिए !
लेकिन  नहीं ! मैं  नहीं  समझा  पाती  हूँ  खुद  को !
एक  ही  सोच , दिल  में  घर  किये  बैठा  है ,
एक  ही  डर  धडकनों  में  आवेज़ां  है ,
वो  जा  रहा  है , फिर  कभी  न  आने  के  लिए !
ये  रात  ये  चाँद  उसका  इंतज़ार  करते  रहेंगे ,
और  नहीं.......वो कभी   नहीं  लौटेगा !
ठीक  तुम्हारी  तरह !
हाँ  ठीक  तुम्हारी  तरह ,
जिस  तरह  एक  दिन  तुम  गए  न  लौटकर  आने  के  लिए
ये  चाँद  अकेला  है ,
बिलकुल  मेरी  तरह!!

हर  एक  याद  उसने  मेरे  घर  में  छोड़ दिया ,
कुछ  तो  साथ  ले  जाता, मुझे छोड़ के जानेवाला !

यहाँ से ले चलो

बस  और  नहीं ….नहीं  सह  सकती  और  ज्यादिती   इस  दुनिया  की , ले  चलो  मुझे  यहाँ  से  कहीं  दूर , इतनी  दूर  जहाँ  मुझे  जाननेवाला  कोई  न  हो , जहाँ  मेरे  ज़ख्म  कुरेदनेवाला  कोई  न  हो , जहाँ  इस  दर्द  को  बढ़ानेवाला  कोई  ना  हो!!

 हर  बार  तुम  गए , ये  कहके   के  जल्द ही  लौटूंगा , पर  नहीं ऐसा कभी नहीं हुआ, तुमने  हमेशा  देर  की , अब  बस , इस  बार  आए  हो  तो  मुझे  छोड़के  मत  जाना , मुझे  अपने  साथ  ले  जाना , मुझको  मेरी  हस्ती  समेटनी   है  इस  अनजाने  शहर  में  जो  बिखरी  पड़ी  है  यहाँ  वहां , तुम्हारे  जाने  और  आने  के  फासले  ने  मेरी  तो  जैसे  ज़िन्दगी  ही  बदल  दी , अब  और  बर्दाश्त  नहीं  होता , दम  घुटता  है  इन  लोगों  के  बीच , ये  सब  फरेबी  हैं , ले  चलो  मुझे , समंदर  पार  ले  जाना , वहां  दोनों  मिलके  अपनी  दुनिया  बसाएँगे , वो  ख्वाब  जो  बरसों  से  सूनी  आँखों  में  पल  रहे  हैं , उनकी  कसम  है  तुम्हे , मुझे  अपने  साथ  ले  चलो , उन्  ख्वाबों  को  एक  बार , सीर्फ  एक  बार  सच  होने  दो , ले  चलो  मुझे …यहाँ  से  ले  चलो !!

Friday, September 16, 2011

तेरी सूरत

मेरे  दिल  पे  छपी  जो  एक,  महज़  तस्वीर  है  शायद ,

तेरी  सूरत  जो  है  वो  ही,  मेरी  तक़दीर  है  शायद ,



ये  है  ख़ुशबू   के या .. हवा का एक झोका ,  ये  बता  दे  तू ,

तुझे  छू  कर  जो  गुजरी  उस  हवा  को  मोड़  दे  बस  तू ,



तू  है  एक  ख़ाब  या  के  एक  सच्चाई  की  है  मूरत ,

तू  जो  है , जैसा  है , मेरे  लिए  बस  तू  ही  है  शायद ,



कई  दिन  से  इन   गलियों  में  छुपकर  चाँद  बैठा  है ,

मेरे  दिल  को  यकीं  है  एक  तुझसे  छुप  के  बैठा  है ,

कहीं  उससे   तू  ले  के  धूप  अपनी  चल  न  दे  वापस ,

वो  जो  तेरा  है , तेरी  शक्सियत  का  एक  हिस्सा  है ,



वो  एक  ही  खौफ  दिल  में  जाने  कबसे  घुस  के  बैठा  है ,

कई  सालों  से  वो  जाता  नहीं , बस  छुप  के  बैठा  है ,

के  तू  एक  दिन  मुझे  छोड़ेगा  मुझको  भूल  जाएगा ,

मेरा  दिल  तोड़कर  तू  अपनी  एक  दुनिया  बसाएगा ,



कहीं  ऐसा  न  हो , तू  रूठकर  चल  दे  कहीं  ज़ालिम ,

मेरे  होने  न  होने  से  तुझे  जो  फर्क  पड़ता  है ,

वो  एक  एहसास  जो  दरमियान  है , वो  ग़ुम  हो  जाए  न

कहीं   कोई  बेवफा  तुझसे   मेरा  दामन  छुडाए  न ,



के  जब  के  आज   भी  मुझको  यकीं  है  अपनी  किस्मत  पे ,

तेरी  सूरत  जो  है  वो  ही  मेरी  तक़दीर  है  शायद ,

Wednesday, September 14, 2011

रहने दो

मुझको  अब  बस  इसी  हल  में  रहने  दो ,

मेरी  उम्मीदें  अब  और  न  बढ़ाओ , बस  रहने  दो ,

तुमपे  अब  ऐतबार  नहीं  कर  सकती ,

और  किसी  से  भी  प्यार  नहीं  कर  सकती ,

तुम  हो , जैसे  हो , चाहे  जिसके  हो ,

तुम  मेहरबान  हो   के  काफ़िर  हो,

मेरे  करीब  न  आओ …बस  रहने  दो,.

मेरी  उम्मीदें  अब  और  न  बढ़ाओ , बस  रहने  दो ,

Saturday, September 10, 2011

चुप्पी

हमारी ना मंजिल एक थी और ना रस्ते, ये तो हम दोनों हमेशा से जानते थे, फिर हमने एक दूसरे से ऐसी उम्मीदें क्यूँ रखी!! क्यूँ मैंने तुमसे उम्मीद की और तुमने मुझसे! क्यूँ सिलसिला ये साथ का चलता रहा सालों तक?क्यूँ तुमने मेरी रुखसत के वक़्त, भरी निगाह से मुझे देखा और कुछ कहते कहते रह गए?? क्यूँ मैंने उम्मीद की तुमसे के तुम आओ  थाम लो हाथ मेरा, रोक लो मुझको, मैं तुमसे दूर जाना नहीं चाहती थी…….तुम्हारे चेहरे पे मेरी निगाह टंग सी गयी थी! थोडा घबराकर शायद तुमने नज़र फेर ली थी, शायद बचना चाहते थे तुम उन सवालों से!! …दिल में हजारों बातें और जुबां खामोश…बिलकुल खामोश थी, तुम्हे चुप  रहने की आदत थी, कुछ कहने से पहले सौ बार सोचते थे, शायद इसी चुप्पी को मैं पसंद करती थी, शायद इसी चुप्पी से मुझे प्यार हुआ था, और शायद इसी चुप्पी ने मुझे तुमसे दूर ला फेका!!

ये घर अब मेरा छोटा है,

तू जो लौटा तो बड़ी देर से तू लौटा है,
तेरे कद के लिए, ये घर अब मेरा छोटा है,
रूठकर तू जो एक बार गया था मुझसे,
छोड़कर हाथ मेरा, मुह भी तूने मोड़ा था,
मेरी आवाज़ भी तुझतक पहुच ना पाई थी,
मेरे आंसू, मेरे दामन भिगोते जाते थे
कभी रोते हुए जो सिसकियाँ भी निकली तो,
मैंने उनको भी खुद में बस यूँही छुपाया था,
तेरे जाने से सारे ख़ाब मेरे टूट गए,
तेरे जाने से मेरी शक्सियत अधूरी हुई,
मेरे ज़ख्मों पे ज़माना भी मुस्कुराया था,
पर मेरी यादों में तब भी वो तेरा साया था
दिन भी गुज़रे थे वैसे ठीक जैसे रात  गुज़री ,
तेरे यादों की डली लेते हुए साल  गुज़री 
कई सालों तक मुरके तूने कभी देखा नहीं,
मेरी हालत , मेरी चाहत , की तुझको परवाह ही नहीं
और जब टूटकर बिखरने को तैयार हुई,
रस्में दुनियां को निभाने मैं तैयार हुई,
तब तू लौटा है जब मैं ज़िन्दगी से हार गयी,
तू जो लौटा तो बड़ी देर से तू लौटा है,
तेरे कद के लिए, ये घर अब मेरा छोटा है,

Thursday, September 1, 2011

आज की रात फिर नींद किसे आएगी

क्या साज़-ए-ज़िन्दगी कभी यूँ भी गुनगुनाएगी, के एक रात तेरी याद तक न आएगी?
शाम से बोझिल हुई इन आँखों में, तेरे चेहरे की धूप आज फिर समाएगी,
आज की रात फिर नींद किसे आएगी! आज की रात फिर नींद किसे आएगी!