Friday, December 28, 2012

सोचती हूँ, कभी यूँ भी तो होगा न!

सोचती हूँ,
कभी यूँ भी तो होगा न,
कि तुम लौटकर आओगे घर और दोगे आवाज़ मुझे,
जाओगे अन्दर के कमरे में, टेरिस पर, किचन में,
और फिर याद आएगा तुम्हे, कि मैं तुमसे रूठकर दूर चली गयी हूँ,
उलटे पाँव लौटोगे तुम, बेतहाशा दौड़ते हुए, ढूंढोगे मुझे,
पूछोगे हर राहगीर से,
एक मासूम सी भोली सी लड़की देखी है, वो मेरी पत्नी है?
जिसके हाथों में हैं चूड़ीयाँ और माथे पर बिंदियाँ सजा राखी है,
हाथो में मेहंदी है मेरे नाम की,
मैंने कई बार दिल तोड़ा है उसका, और सोचा हमेशा यही के रहेगी मेरे साथ हर हाल में, वो गयी भी नहीं, कहीं भी, कभी भी..पिछले कई साल में,
पर कल रात मैंने अपनी हर हदें पार कर दी,
उसकी मासूमियत को कुचल डाला, उसको अपमान के कई शब्द बोले,
वो रूठकर बैठी थी वहीँ टेरिस पर,
जहाँ उसने लगाये थे अनगिनत पौधे,
और जिनका करती थी वो देखभाल ठीक अपने बच्चे की तरह,
कहो..देखा है किसी ने उसे,
उसकी आँखें बड़ी हैं, और सुन्दर भी, पर कल रात भर वो रोती रही,
सुबह मैंने उसका चेहरा एक बार भी देखा नहीं, और चला गया था उसे छोड़कर,
मैं आश्वस्त था के वो यहीं मिलेगी, यही टेरिस पर मेरा इंतजार करती मिलेगी मुझको  पर आज वो मिली नहीं,
किसी ने देखा है उसे??

समझौता

मैँने कभी समझौता नही किया....
ग़ैरत से,
इमान से,
धर्म से,
रिवाज़ से,
परिस्थिति से,
समाज से
और वक़्त से.......
टुकड़े टुकड़े मेँ इन सब ने तोड़ा है मुझे।
 

Tuesday, December 25, 2012

शादी

कैसे कर पाते हो तुम ये सब,
कि तोड़ देते हो दिल को मेरे,
भरोसे को और उम्मीद को,
और चल देते हो हाथ डुलाते हुए,
कुछ ऐसे कि जैसे मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती,
कुछ भी नहीं लगती!
वो रिश्ता जो पिरोया था तुमने समाज को साक्षी मानकर,
वो फेरे कि जिनको लेते वक़्त खायी थी तुमने कसमें,
के थामे रखोगे हाथ मेरा,
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर,
हर दर्द मुझसे पहले तुमसे होकर गुजरेगी,
फिर ऐसा मुमकिन कैसे हो पाता है तुम्हारे लिए,
कि जब भी कोई ज़ख्म राह में होता है,
करता हुआ इंतज़ार,
और फिर करता है प्रहार,
तुम कर देते हो मेरा हाथ पकड़कर आगे,
और छोड़ देते हो अकेली जूझने के लिए,
भूल जाते हो वो आँचल,
कि जिसकी छाँव में तुमने अनगिनत साल गुज़ारे हैं,
भूल जाते हो वो दुआएं,
जिनकी वजह से तुमने ऊँचाइयों को छुआ है,
भूल जाते हो इस बात को
कि एक लड़की ने अपना सबकुछ छोड़ दिया
सिर्फ तुम्हारा साथ निभाने के लिए,
क्या उसे छोड़ते हुए तुम्हे दर्द नहीं होता?
क्या कुछ भी फर्क नहीं पड़ता
कुछ भी महसूस नहीं होता तुम्हे?

दर्द की वजह

क्यूँ हर बार लोग जानना चाहते हैं एक नयी वजह, दर्द होने की?
जब भी कोई पूछता है, के क्या हुआ और बताओ उन्हें दर्द और आंसुओं की वजह,
तो देते हैं सब सहानुभूति,
और भूल जाते हैं सबकुछ बहुत जल्द,
फिर उदास चेहरा देखकर अगले दिन पूछते हैं,
क्या हुआ?
इस ‘क्या हुआ’ के प्रश्न से होती है मुझको नफरत,
क्या ये ज़रूरी है के हर बार दर्द की वजह एक नया और ताजा ज़ख्म हो??

प्यार बस प्यार होता है...

उम्र चाहे कोई भी हो, जब प्यार होता है, तो लडकियां अक्सर बच्चों की सी हो जाती है, अपने प्रियतम से गिला, शिकवा करना, रूठना, नखरे करना, ये सब जैसे खुद-ब-खुद आ जाता है, तनहा हो या भीड़ में, बेवजह मुस्कुराने लगती है, कभी कोई भूले से नाम भी ले ले उनका, तो आँखों में एक खास चमक आ जाती है..सड़क पर चलते हुए अमूमन लड़की हर राहगीर में अपने प्रियतम को तलाशती है..कभी यूँ भी होता है वो किसी को देख मुस्कुरा रही होती है, इस बात की कोई परवाह नहीं होती उसे, कि जिसे वो देख मुस्कुरा रही है, वो कौन है, असल में वो देख ही नहीं रही होती, उसकी नज़रें भले ही उस शख्स पर टिकी हो जो सामने है, फिर भी उसकी ज़हन में किसी ख़ास का चेहरा होता है..दिल में हर वक़्त जैसे जलतरंग बज रहे होते हैं..वो बस खुश होती है...

प्यार सोच समझ कर नहीं होता...बस हो जाता है.., प्यार में दीवानगी लाज़मी है, प्यार में हदें तय नहीं होती, प्यार में कोई पराया नहीं लगता, प्यार में कभी बंधन महसूस नहीं होता.. प्यार एक खुशनुमा एहसास है..प्यार एक साज़ है, संगीत है, प्यार गीत है, प्यार ही ख़ामोशी है और प्यार ही आवाज़ भी..हर शख्स इस अहसास से कम से कम एक बार ज़रूर गुजरता है, सही मायने में वो इंसान ही तभी बनता है, जब उसे प्यार होता है... ‘प्यार जिससे हो, ये ज़रूरी नहीं कि वो सबसे बेहतर हो, पर एक बार प्यार हो जाए तो उससे बेहतर कोई नहीं लगता’...प्यार के लिए कोई उम्र निश्चित नहीं, प्यार की कोई हद निश्चित नहीं...प्यार एकतरफा या दोतरफा नहीं होता...प्यार बस बसता है अन्दर...हमारे अन्दर है, हमारे रगों में खुशबु की तरह फ़ैल जाता है, वो खुशबु होती है उसके नाम की, प्यार कभी ख़त्म नहीं होता, प्यार असीम है, प्यार शरीर का मोहताज नहीं प्यार रूह में बस्ता है..प्यार को शब्दों में बंधा नहीं जा सकता, प्यार की कोई परिभाषा नहीं........प्यार बस प्यार होता है...

Monday, December 24, 2012

तुम्हारा इंतजार है.......

'ग़ज़ब है तुम्हारी याद भी कि आती है जब भी  
लिए जाती है मेरा हाथ पकड़कर दूर रेगिस्तानों में,
भटकती हूँ देर तलक, उन्ही बंजर रेतों पर,
करती हूँ इंतज़ार सुबह होने का,
सोचती हूँ एक बार आओगे तुम मेरा हाथ थामोगे और
कह दोगे वो सब जो सुनने के लिए ही बस मैं जिंदा हूँ'

'हालाँकि क्या कुछ नहीं करती हूँ मैं,
तुम्हारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए,
मिसाल के तौर पर,
हर शाम सूरज से करती हूँ गुजारिश
कि लौट जाए वो
और आने दे चाँद को उस नीले नभ पर,
कि चांदनी छुए तुम्हारे चेहरे को और
तुम्हे मैं याद आऊं'
 
'कभी तो फेर दे नज़र इस तरफ भी ऐ ज़ालिम,
तेरी खामोश नज़र मुझे हर पल ही क़त्ल करती है...'

Saturday, December 22, 2012

इंतज़ार

शाम करीब छ: साढ़े छ: का वक़्त था, चाँद को जाने अचानक क्या हुआ कि उठी और निकल पड़ी समंदर के किनारे, वो अक्सर आया करती थी, जब भी बेहद तनहा महसूस करती....आज भी कुछ ऐसा ही हुआ था, उसके कदम आगे की ओर चलते जा रहे थे और वो..........................................

अभी तुम्हे बेहद शिद्दत से याद किया और चाहे अनचाहे उम्मीद कर बैठी के तुम आओगे पर तुम नहीं आए....एक गाना सुन रही थी और सुनते सुनते बहुत रोई.. हाँ ये कोई ख़ास गाना नहीं था, पर ये गाना हमारे नए नए प्यार का गवाह है... जाग उठी हैं नींदें, चैन कहीं खो गया है उन दिनों ऐसे अलबम सोंग्स आया करते थे, ये गाना तुम जब भी देखते, तो देखते ही तुम्हारे चेहरे की मुस्कान खो जाती, इस गाने में नायिका ने बेवफाई की है....तुमने एक बार मेरा हाथ थाम मुझे रोक लिया था, और पूछा था, चाँद, तुम इतनी खूबसूरत हो, और मैं एक सिम्पल सा लड़का, कहीं....कभी तुम्हे, तुम्हारी पसंद पर अफ़सोस तो नहीं होगा? मुझे छोडोगी तो नहीं न? तुम्हारी बात सुन मेरी पलकें भीग गयी थी और मैं बस इतना ही कह पायी थी कि तुम उदास न हो, मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे सिवा कोई न आएगा...तुम्हे मैंने अपना सबकुछ माना था, इस से ज्यादा कुछ कहना नहीं आता था, उम्र भी कम थी और अपने एहसास को ज़ाहिर करने का तरीका तब भी नहीं आता था, आज उस वक़्त को गुज़रे दस साल हो गए, इन दस सालों में सबकुछ बदल गया, हमदोनो ने सिर्फ एक ही क़सम खायी थी कि चाहे हालात बदल जाएं, चाहे दुनिया, चाहे परिस्थिति प्रतिकूल हो जाए, पर हमारे एहसास कभी न बदलेंगे, मैंने जाने कितनी ही बार कहा था कि मेरे लिए मैं खुद इतना मायने नहीं रखती जितना तुम रखते हो, वो सारे व्रत उपवास जो अमूमन एक ब्याहता करती है, वो मैं किया करती थी, और शाम को तुम पेप्सी पिलाते और अपने हाथों से समोसे का एक टुकड़ा खिलाकर मेरा व्रत खुलवाते, और मैं तुम्हारे पैर छूकर तुम्हारा आशीर्वाद लेती, जानते हो वो पैर छूने का रिवाज़ बचपन से देखती आई थी, जब माँ..बाबूजी का पैर छूती और बाबूजी मुस्कुराते हुए माँ को सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद देते....तो हमेशा यही सोचा करती थी, कि  क्या कभी मेरी ज़िन्दगी में कोई ऐसा ही इंसान आएगा, जिसकी मैं इतनी श्रद्धा करूँ, जिसका मैं इतना सम्मान करूँ? और मुझे तुम मिल गए...तुमने मुझे पूर्णता का एहसास दिलाया, सच.... कभी कभी सोचती हूँ, कि  तुमसे मिलने से पहले भी तो ज़िन्दगी थी मेरी, पर पहले की हर बात फीकी सी लगती है, हर मुस्कान में खोखलेपन का एहसास है, और हर दिन बेमाने से...मेरी ज़िन्दगी को मायने तुमने दिए..........मुझे अब भी याद है मेरे व्रत वाले दिन तुम बार बार फोन करते और पूछते कि कमजोरी तो नहीं लग रही और शाम ऑफिस से जल्दी निकल के मुझे पिक करते...मेरा चेहरा देख तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान बिखर जाती, फिर तुम कहते... क्यूँ करती हो ये सब? तुम्हे इस तरह व्रत करने की क्या ज़रुरत है? मैं तो हूँ ही तुम्हारे पास, तो मैं हँसते हुए कहती... करती हूँ कि कहीं मेरे विश्वामित्र पर किसी मेनका की नज़र न पड़ जाए और तुम कहते, बस एक ही मेनका उपरवाले ने बनायी थी इस विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए..........ये बात तुमने जाने कितनी ही बार कहा है, पर हर बार तुमसे ये सब सुनना अच्छा ही लगा है, सच...तुम जब कभी मजाक में मुझे मिसेज़ बोलके अपना सरनेम जोड़ते तो बहुत अच्छा लगता था, एक बार याद है, जब तुम्हारी बाईक रेड लाइट पर रुकी थी और एक भिखारन आई थी पैसे मांगने, अमूमन तुम मना कर देते और मैं भी नहीं देती...पर उसने कहा था तुमदोनो की जोड़ी सलामत रहे फिर तो तुम हंस पड़े, क्यूंकि तुम जानते थे के अब मैं अपने पर्स से ज्यादा से ज्यादा पैसे उसे दे दूंगी...मेरे पैसे देने के बाद तुमने कैसे हँसते हुए कहा था, तुम्हे तो कोई भी बेवकूफ बना सकता है, बस मेरा नाम ले ले...और तुम अपनी सारी संपत्ति उसके नाम कर दोगी...ये सब कहते हुए तुम्हारे चेहरे पर एक चमक, एक गर्व का भाव था, जैसे तुम्हे इस दुनिया में सबसे बेहतर लड़की मिल गयी है, जो मात्र एक लड़की नहीं, बल्कि तुम्हारी संपत्ति है....तुम हँसे जा रहे थे, और मेरी नज़र बाईक के साइड मिरर पर टिकी थी........सच तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान बेहद अच्छी लगती थी,

अब भी लगती है...मुझे तुम बेहद पसंद हो...कल भी थे, आज भी हो...हाँ आज भी हो....हर रिश्ते में ग़लतफ़हमी आती है, हमारे रिश्ते में भी आई है, तुम्हे लगने लगा है कि मुझे तुमसे प्यार नहीं,...पर बात बस इतनी सी है कि  दुनियादारी, परिस्थिति और वक़्त इन सब ने अपना असर मुझपर छोड़ा है, पर तुम्हारे लिए एहसास अब भी वही हैं...आज भी तुम्हारी एक आहट के इंतज़ार में शाम गुज़र जाती है, आज भी तुम्हारा कोई नाम ले तो, दिल की धड़कने अपनी गति भूल जाती है, आज भी मेरे चेहरे पर आई हर मुस्कान की वजह सिर्फ तुम हो, शादी के पहले भी हमारे बीच कई बार तलाक़ हुए और कई बार सुलह....पर इतने सालों में ऐसा कभी पहले नहीं हुआ कि तुम जाओ, और फिर लौटकर न आओ...पर इस बार.....................

चाँद तनहा अकेली, चली जा रही है, समन्दर की लहरों से लडती, वो तनहा है, हर पल हर घडी, पर एक भीड़ उसको घेरे है, उसे कहीं चैन नहीं....कहीं भी नहीं....सिर्फ एक इंतज़ार है.. उस शख्स का ...जो उसका सबकुछ है...सबकुछ.......

Wednesday, December 12, 2012

बारहाँ

बारहाँ तुमने मुझे ग़लत ठहराया है,
बारहाँ मेरे प्यार को ठुकराया है,
फिर भी जब जब आई है मुझे बेइन्तहाँ याद तुम्हारी,
कैसे भला मुझे तुमने एक झलक दिखाया है,
कभी यूँ तो करती नहीं कि आ जाऊं,
और करूँ मिन्नत तुम्हारी,
पकड़ लूँ हाथ और कह दूँ कि मुझे छोड़ के अब न जाना तुम,
तुम्हारे बिन एक सांस भी खुलकर आती नहीं सीने में,
ज़िन्दगी के सारे रंग बेमाने हैं बेरंग हैं,
नहीं ऐसा कभी भी हुआ नहीं,
पर फिर भी जाने क्या बात है,
कि जब हो जाती हूँ बेज़ार, रह जाती हूँ एक बुत सी, खामोश, बेहद तनहा, आँखें जब लगती हैं पथराने, और सब हो जाता है बेमाने,
कि आते हो तुम,
कि आते हो तुम एक हवा के झोंके के साथ
और छू लेते हो मुझे, भर देते हो चंद और उधार की सांसें, डाल देते हो ज़रा सी जान इस मुर्दा लड़की में,
ये क्या है, जो प्यार नहीं तो क्या है...कहो?  

Monday, December 10, 2012

हाँ तुम्हारी उम्र में मैं समझदार न थी....

नहीं जानती थी कि दुनियां क्या है,
क्या है ये रस्में ये रिवाजें
कि जिनके आगे भूल जाते हैं लोग सबकुछ,
भूल जाते हैं वो कसमें जो खायी थी किसी का हाथ थामकर,
भूल जाते हैं वो तमाम वादें, जिन वादों के डोर थामे चल देता है कोई बगैर सोचे बगैर समझे,
भूल जाते हैं वो आँखें कि जिनको देखे बगैर होती न थी सुबह, ढलती न थी शाम,
उनदिनों मैं अक्सर सोचा करती थी कि मोहब्बत से ऊपर कुछ भी नहीं,
जिस शख्स को मिल जाए वो,
जिस से वो करता है बेपनाह मोहब्बत,
फिर और किसी भी चीज़ की होती नहीं दरकार,
मुहब्बत एक खुमारी है के जब चढ़ जाए तो कुछ और नज़र आता ही नहीं,
बस वो एक शख्स नज़र आता है, के जिसको मान बैठते हैं हम अपनी किस्मत,
उस एक शख्स का साथ पाने के लिए हम सबकुछ भूल बैठते हैं,
भूल बैठते हैं के सच ये नहीं.....कुछ और है,
सच है.....मजबूरी, लाचारी, रस्म, समाज,
और इनका असर होता है हमपर कुछ इस तरह के हम रह जाते हैं सदा के लिए
तनहा, अकेले, बंजारों सा ये मन हो जाता है,
इस बंजारे मन में रह जाती है चंद यादें, नाकाम हौसले, डर, घबराहट, दर्द, बेचैनी, परेशानी और एक वक़्त के बाद वो भी नहीं रहता, जब हो जाता है सबकुछ जल कर ख़ाक, तो कहलाते हैं हम समझदार...............
हाँ तुम्हारी उम्र में मैं समझदार न थी..............

आँखें

अमूमन लोगोँ को कहते सुना है कि मेरी आँखेँ बहुत गहरी हैँ, ये आँखेँ बहुत कुछ कहती हैँ, किसी ने ये भी कहा था कि डोरे देखेँ हैँ इन आँखोँ मेँ तो किसी ने वो राज़ जानने की कोशिश भी की जिसकी हर तार जुड़ी है सिर्फ़ तुमसे, किसी ने इन आँखोँ मेँ बसी उदासी का सबब जानना चाहा तो कोई पूछ बैठा कि इंतज़ार किसका है? कभी यूँ भी हुआ कि आँखो के कोरोँ से झलक पड़ी एक मुस्कान जो पनपी थी उस एक लम्हे मेँ जब तुमने नज़रोँ से मुझको छुआ था....कितनी अजीब बात है न कि तुम न तो आँखोँ की भाषा ही पढ़ सके न मेरी जुबां ही समझे......................

बस यूँ ही...

बदला कुछ हमदोनो के बीच नहीं,
जो बदला, वो मेरे अन्दर बदला है,
तुम्हारा मुझे छोड़कर जाने का रंग इतना गाढ़ा है,
के तुम लौट आए हो, इसपर यकीन अब होता नहीं


काश एहसास मिला करते बाज़ार में,
के जब कम होने लगते मेरे अन्दर,
तो ले आती मैं खरीद के
और दे देती तुम्हे,
सबकुछ वही पहले सा,
अपनी वही महकी सी मुस्कान,
वही हाथों की गर्मी,
वही परवाह भरी निगाहें,
तुम्हारी निगाहों के हर सवाल का एक सटीक सा जवाब होता मेरे पास,
आज कुछ भी पाती नहीं अपने अन्दर,
बची हैं तो सिर्फ चंद घिसी हुई लकीरें,
और कुछ फीकी सी हंसी.........


 

 

Friday, December 7, 2012

बस यूँ ही....

जानती हूँ के तुम समझाने की कोशिश कर रहे थे,
वक़्त, दुनिया, समाज, और समझ की बातें कर रहे थे,
पर प्यार में समझाने से कब कौन समझा है?
अब दर्द मिला है, खुद ही समझ जाउंगी...

दिल फरेब निगाहों से उसकी बचने की हर मुमकिन कोशिश तो की मगर
उसने नज़रों के जाल से हर बार मात दी

जब तुम मिले न थे ज़िन्दगी मुक़म्मल ही थी,
बिछड़ के तुमसे ज़िन्दगी नातमाम हो गयी...
 

बेतहाशा दौड़ते रहे कई सदियों तक,
एक तेरा दामन थामने के वास्ते,
न तू मिला न रहगुज़र न दामन ही तेरा,
आज लौटे तो साथ बची तन्हाई...
 

सांवरे से नैन मिले, नैन हुए बावरे,
कोई कहे कित छुपाऊं, नैन मोरे बाँवरे..

 बार एक दर्द हुआ, तुझे याद मैंने जब जब किया,
तेरी याद के साए में मेरी रुसवाइयों के लम्हे थे..
 

वो जो मुझको मेरी हदों में रहने की सलाह देता रहा,
आज खुद पे आई तो सारी सरहदें भूल गया..
 

कभी कभी सोचती हूँ के भ्रम में जीना बेहतर है, या 'सच' में?
भ्रम मुस्कुराने की वजह देता है, और 'सच'...कडवी मिर्च आँखों में डालता है,
भ्रम कुछ वक़्त के लिए ही सही हमें हमारी अहमियत बताता है, और 'सच'...हमेशा धरातल पर पटकता है.........

पर एक 'सच' ये भी है के भ्रम की उम्र चाहे कितनी भी लम्बी हो, वो ख़त्म हो जाती है एक दिन, और तब सच और भी कड़वा लगता है.............
 

दिल तड़पता रहा उसके जाने के बाद,
मौत आई न मुझे जिस्म के मर जाने के बाद.
 

Wednesday, December 5, 2012

कितने छल और?

चलते चलते सांस जैसे रुकने लगती है, जैसे किसी ने एक जंजीर लगाकर जोर से अपनी ओर खीचा हो, एक पल में दिल सारी हकीक़त भूलकर भागने लगता है तुम्हारी परछाई के पीछे, और तुम भागते जाते हो किसी अँधेरे जंगल में, इस भाग दौड़ में हार अक्सर मेरे दिल की होती है, जो लौट आता है नाकाम सा हाथ डुलाते हुए, सर झुकाए हुए, जब दूर से दिखता है, नाकामी उसकी शक्ल में होती है, जिसे देख पाती हूँ सीर्फ मैं, फिर से भर लेती हूँ अपने सीने के अन्दर और करती हूँ कोशिश के बाँध दूं उसे सच्चाई के धागे से, और कह दूँ के ऐ दिल अब बस कर, मत सोच और उसके बारे में, के हर बार की तेरी नाकामी मुझे कर देती है और भी कमज़ोर, तू जब जब जाता है मुझको छोड़ कर उसके पीछे मैं हार सी जाती हूँ, और डर जाती हूँ पल पल, के इस बार तू लौटेगा के नहीं, वो कहता कुछ नहीं बस बैठ जाता है अपनी आँखें मूंदकर फिर से तुम्हारी उस एक झलक के इंतज़ार में...

बस यूँ ही

अजब इत्तेफाक है
के वो तो कुछ कहते ही नहीं,
और उनकी आँखें चुप रहती भी नहीं..
के जब भी निश्चय करती हूँ,
फिर लौट के न आउंगी,
वो अपनी नज़रों से एक खामोश, अनदेखा सा जाल फेंकते हैं,
और कर लेते हैं क़ैद मुझे..
उस दायरे में के जहां मेरी सोच पर भी रहता नहीं इख्त्यार मेरा,
कभी कभी सोचती हूँ कहीं मैं मीरा तो नहीं बन बैठी अपने कृष्ण की... 

ये चेहरे पर मुस्कान क्यूँ बिख़र जाती है, कम्बख़्त धड़कने तहज़ीब क्यूँ भूल जाती हैँ, तुम्हारी एक आहट और सारी भौगोलिक दूरी मैँ कैसे भूल जाती हूँ, कैसे भूल जाती हूँ कि तुमने मुझे अस्वीकार कर दिया।..........

मैने ख़ुद अपने हाथो बंद कर दिये वो तमाम रास्ते जो तुमसे मुझतक पहोँचते थे, फ़िर जाने क्यूँ बार बार तुम्हारी गली मेँ आती हूँ, आते जाते लोगोँ से तुम्हारी ख़ैरियत पूछती हूँ ऑर करती हूँ इंतज़ार के कोई यृँ भी कहे के तुमने मुझे याद किया, के तुम्हे ग़म है अपने जुदा होने का।...................

 

एक सुकून

कितनी अजीब बात है न, दिल कभी अपनी नाकामी पर अफ़सोस करता है, कभी रोता है, कभी बेचैन सा हो जाता है, कभी यूँ भी देखा है, कि एक मायूस सी रात मेँ सुकून की लहर सी दौड़ गई जब ये सोचा कि तुम्हारे पास कोई है जिसे तुम्हारी फ़िक्र है, जो तुम्हारा ख़्याल रखती हैँ, अच्छा एक बात बताओ क्या अब भी रात को जब तुम गहरी नीँद मेँ होते हो, तो फेँक देते हो रज़ाई, और सो जाते हो एक मासूम बच्चे की तरह ख़ुद मेँ सिमट कर, वो फ़िर से रज़ाई तुम्हे ओढ़ाती तो है न ठीक उसी तरह के जिस तरह मैँ होती थी नीँद मेँ पर जाने कैसे रात भर टंगी रहती थी एक निगाह उस बिस्तर पे जहाँ तुम कभी करवट बदलते, और कभी औँधे परे देखते रहते मुझे एकटक.......
 

शायद भ्रम

और वो है बिलकुल भोला सा,
कुछ ऐसा जैसा आमतौर पर कोई होता नहीं,
के हर बात उसकी वो मान लेता है सच,
सोचता नहीं कुछ भी जब से उसने प्यार किया उस से,
सीर्फ इतना ही कहता है 'प्यार भरोसे का नाम है,
और मैंने तुमसे प्यार किया है' तुम ग़लत हो ही नहीं सकती......
सहम जाती है वो उसके भरोसे को देखकर,
कैसे यकीन दिलाये के वो भी मात्र एक इंसान है..
एक आम इंसान जो हालात के हाथों कई बार मजबूर होती है,
वो जज्बा-इ-दिल अब और कहाँ से लाये!
 

 

Monday, December 3, 2012

एक परीक्षा अपनी भी

आज तुम परेशान हो, जब से मैंने तुमसे ये कहा के मैं अब और दिखावा नहीं कर सकती के मुझको अब कुछ भी महसूस नहीं होता है............तुम्हारे होते हुए भी रहती हूँ तनहा अकेली और जब तुम होते नहीं तो वो जुदाई का वक़्त रह रह कर याद आता है, मैंने ये भी कहा था के अब मुझको कुछ भी महसूस होता नहीं के मुझे तुम छूते हो तो वो पहले से हरहराहत नहीं होती है, और जो चले जाते हो तो इंतज़ार नहीं रहता अब, तुम जब कहते हो के तुम्हे प्यार है मुझसे अब भी पर ग़म है दुनिया के, तुम्हारा प्यार नज़र आता नहीं बस वो एक शख्स नज़र आता है के जिसके काँधे पर, लदी हैं बोझ जिम्मेदारियों की जो प्यार तो कर सकता है पर स्वीकार नहीं कर सकता...

मुझमें दर्द भरा है और कुछ भी नहीं, कुछ भी बचा नहीं के दे दूँ और कह दूं के ले लो वही एहसास फिर से ले लो मेरा समर्पण और देखो वही फिक्र मेरी आँखों में, ये सब नहीं कह सकती...

रात ठंडी हवा बह रही थी और मै देर रात खड़ी रही अपने बालकनी में, मेरे चेहरे को ठंडी हवा कुछ इस तरह से छूती रही के जैसे बर्फ की बारिश हो किसी ठण्ड तनहा सी रात में, मैं देखना चाहती थी के क्या एक बार फिर से उसी तरह मैं देर रात तुम्हारा इंतज़ार करूँ तो लौट आएगा वो पहले सा प्यार? क्या मेरा दिल धड्केगा तुम्हारी हलकी सी आवाज़ से भी, क्या फिर इस दिल में वही पहली सी तरंगे बजेंगी क्या एक बार फिर मैं तुमसे बोलूंगी पूरे एहसास के साथ के ‘मैं तुम्हारे बिन नहीं जी सकती, तुम कभी मुझे छोड़ोगे तो नहीं?’ ऐसी अनगिनत सोच लिए देर रात मैं ठंडी हवाओं से जूझती रही...............

Saturday, November 24, 2012

बस यूँ ही............

'किसी को परवाह नहीं तुम्हारे सिवा मेरी,
बस एक तुम ही हो जो मुझपर नज़र रखते हो,
के जब भी उठकर जरा चलने की कोशिश करती हूँ,
फिर से एक और चोट मुझको रसीद करते हो....'
 

'ये कैसा उम्मीद का दामन थमाते हो हर बार और फ़िर खेँच लेते हो अचानक ही, रह जाती हूँ मैँ निश्प्राण सी, जबकि मैँ किसी मासूम बच्चे की तरह करती हूँ यकीन तुमपर हर बार और तुम?'

'बाहर शहनाई बज रही है जिसके गूंजने की आवाज़ आ रही है, छोटी उम्र की लड़कियां छेड़ रही हैँ दुल्हन को, जिसने ज़ेवर के साथ शर्म भी पहन रखा है, उसकी आँखोँ मेँ उम्मीद है, और अनगिनत ख़ाब हैँ, ज़रा सा ग़म भी है अपनोँ से बिछड़ने का और थोड़ी घबराहट भी । इन सारे अहसासोँ मेँ मात्र घबराहट ही स ही है बाकी बेमाने'

'उसके हाथ में अक्सर एक पत्थर पाया गया है,
हाँ मेरे नाम का पत्थर,
मुझे बताया था किसी ने,
वो जब भी कुछ लिखता है,
मेरा ज़िक्र ज़रूर करता है,
रंजिश निकालने के लिए उसने कलम का सहारा लिया है,
एक अरसे पहले कहा था मुझसे,
अब तुम्हे भुला दूंगा,
के तुम मेरे लिए मायने नहीं रखती,
तुम हो के नहीं इस से मुझे फर्क नहीं पड़ता,
क्या वाकई उसने भुला दिया मुझे?'


'

 

ये ज़िन्दगी कभी मुकममल सी लगती है...

मुझे अब भी याद है कई बार मेरे बाल खुले होते और मैं तुम्हारे पैर पर सर रखकर लेटी होती, एक बार यूँ भी हुआ के तुम अचानक ही बोल पड़े.......’तुम्हारे बाल थोड़े और लम्बे होते न तो तुम एकदम हेमा मालिनी दिखती....और जो आगे चेहरे पर एक लट होती तो बस मीना कुमारी लगती, और’......................बस इतना ही कहा था तुमने के मैं तुमसे रूठकर चली गयी थी कमरे से, और बालकनी में खड़ी हो, उस चाँद को देखने लगी थी के तुम मेर...
े पास आये और मेरा चेहरा अपनी हथेली में थाम कहा था ‘पर इस से क्या होता है...मुझे तो चाँद मिला है, जो बस एक ही था...और ये सुनते ही मैं शर्मा गयी थी, मैंने पूछा था ‘चाय पिओगे?’ तुमने किस तरह मुस्कुराते हुए कहा था, ‘हाँ, पर मैं बनाऊंगा, जब मैं तुम्हे अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाता हूँ तो बहुत अच्छा लगता है’ तुम चाय बनाने पर अक्सर जोर डाला करते थे, वजह बस इतनी थी, के चाय बाने के बाद तुम मुझे कप में नहीं बल्कि ग्लास में चाय देते थे और इतना देते थे के ख़त्म होने में वक़्त लगे, और उतने वक़्त तक मैं तुम्हारे सामने बैठी रहूँ और तुम अपनी कविताएँ सुनाते रहो...सुनाते सुनाते कई बार तुम पूछा भी करते थे ‘बोर तो नहीं हो रही न?’ और मैंने हर बार बस एक ही जवाब दिया था..........’तुमसे जुडी कोई भी बात मेरे लिए अनमोल है’

जानते हो मैंने तुमसे कभी कहा नहीं....पर अक्सर जब मैं साड़ी पहनती तो पहनने के बाद ये देखती के मेरी साड़ी का कलर तुम्हारे शर्ट के कलर से मैच कर रहा है या नहीं....तुम्हारे साथ अपने पसंद को मिलाना बड़ा अच्छा लगता था...

कई बार यूँ भी हुआ के जब आईने के सामने तुम खड़े हुए तैयार हो रहे थे और मैं तुम्हारे करीब आकार खड़ी हुई और तुमने कहा... हमदोनो की जोड़ी कितनी अच्छी लगती है न.............दुनिया की नम्बर वन जोड़ी है......................’

यादें जाने कितनी हैं,
बातें जाने कितनी हैं,

ये ज़िन्दगी कभी मुकममल  सी लगती है...
और कभी साँसों की भी कमी सी लगती है....

Thursday, November 22, 2012

बस यूँ ही.......

'नहीं मुझे तुमसे प्रेम नहीं
जो है, वो स्वार्थ मात्र था,
स्वार्थ, के तुम्हे देख सकूँ एक पूरी उम्र भर के लिए,
स्वार्थ, के भुला दूँ खुदको और हो जाऊं तुम्हारी सदा के लिए,
स्वार्थ, के तुम्हारी एक सांस की खातिर गर देनी परे जान भी तो उफ़ न करूँ,
नहीं मुझे तुमसे प्रेम नहीं
जो है, वो स्वार्थ मात्र था!'
 

'मैंने अपना सारा सामान बाँध लिया है,
तुम्हारी यादें, तुम्हारे खाब, वो सारे पल और हाँ कुछ लफ्ज़ भी तो हैं..
सबको संभाल के एक पोटली में बाँध लिया है,
के इस बार जब तुम आओगे, तो न बोलूंगी के ‘कुछ पल रुको’,
के न दूंगी तुम्हे मौका छोड़ कर के जाने का,
मेरे सामान मेरे साथ लिए, निकल पडूँगी
तुम्हारा हाथ थामे
उसी रास्ते पर के जिसकी मंजिल तुम थे तुम हो.........'


'हर नाकामयाब तजुर्बा एक नए नज़रिए को जन्म देता है.......'
 

'बदली हुई हकीक़त गुज़रा हुआ ज़माना,
 है याद आज भी वो मेरा तेरा फ़साना..........'


'कल चक्खा था तुम्हारे लफ़्ज़ों को,
थोड़े फीके से लगे मुझको,
तुम्हारी खुशबू अब और इनसे नहीं आती!'
 




 

बस यूँ ही.......

'हाँ ये मेरी आदत है,
के मैं सच से अपनी आँखें मूँद लेती हूँ,
कोई जब कहता है, के तुम खुद को धोका दे रही हो,
तो सर घुमा लेती हूँ, और सोचती हूँ के कुछ सुना ही नहीं,
मुझे प्रिय है तुम्हारी यादों में रहना,
तुम्हे सोचना,
‘सच’ की हर बूँद से नफरत है मुझे,
यूँ लगता है कभी कभी
के ज़िन्दगी एक मिली थी वो तो मैं जी चुकी,
अब क्या कर रही हूँ इस दुनिया में...'

'के नकली मुस्कान होठों पर पहने,
समाज के बनाए रिश्ते की लाश काँधे पर उठाए फिरती हूँ!
शायद एक इंतज़ार अब भी मेरे अन्दर बसता है..........'

'उसकी हिकारत भरी नज़रें भी देखी हैं,
के जिसको उम्र भर मैंने खुदा समझा है……'
 

'आज अफ़सोस नहीं मुझको तेरे जाने का,
तेरे होने से भी मेरी ज़िन्दगी बदलती नहीं,
मेरी तकदीर, मेरे बस में कहाँ थी जाना............'
 

 

Tuesday, November 20, 2012

बस यूँ ही..

ये कैसी तन्हाई काले साए के मानिंद छाई है मुझपर,
के उदासी दिल से शुरू हो अब चेहरे तक पहोच आई है,
ये चाँद एक दिन छुपता है,
तो इस आसमान को अकेलापन काटने को दौड़ता है,
और हर कोई जुट जाता है,
उसके उस अंधकार को उजाले में तब्दील करने के लिए,
पर मेरी ज़िन्दगी का अमावास कब छटेगा,
आखिर क्या है जिसका इंतज़ार ख़त्म ही नहीं होता,
खुद से सवाल कर कर के अब थक गयी हूँ,
मैं, अब मेरे दिल से घबराने लगी हूँ,
जाने कैसी जिद्द किये बैठा है,
के मुझको एक पल सुकून का ये बक्श्ता नहीं,
इसे देखते ही डर जाती हूँ,
के फिर वही उदासी की पोटली लिए आता होगा,
फिर उन्ही राहों से गुजारेगा मुझको,
फिर नज़रें धुंधलाएंगी आंसुओं से मेरी,
फिर वीरान कर के जाएगा मेरी हस्ती को............. 

Monday, November 19, 2012

क्या है ये ज़िन्दगी, क्या हैं ये रिश्ते

कुछ भी तो नहीं हुआ ,
कुछ भी तो नहीं
फिर ये अचानक मेरी आँखों के कोरों से आंसू क्यूँ छलक गए!

‘मैडम आपके लिए किसी का मेरेज कार्ड है’, पोस्टमैन ने कार्ड थमाते हुए आरती से कहा, आरती के हाथ में कार्ड आया ही था के फ़ोन की घंटी बज गयी, ‘तुम्हे कार्ड मिला? ’फ़ोन पर आकाश था, ‘जरा ठहरो, आरती बस इतना ही कह सकी, सवाल सुनते ही आरती का दिल बैठ गया, वो चुप थी, आरती ने एन्वेलप खोला और पढ़ना शुरू किया, आकाश ने खुद अपनी शादी का इनविटेशन कार्ड तैयार किया था, वो पढ़ती जा रही थी और उसका दिल बैठा जा रहा था, पढ़ने के बाद उसने आकाश से बस इतना ही कहा ‘खुश रहो हमेशा, मेरी दुआ तुम्हारे साथ है!’...........उसे मालूम भी न चला कब उसके आँख से आंसू छलक पड़े! एक पल पहले तक वो सोच रही थी के वो आकाश को भूल गई है, उसकी शादी होने वाली है ये तो वो पहले से जानती थी, ‘हाँ यही तो वो वजह थी के उसने खुद को आकाश से दूर कर लिया था, उसने तो बस इतना ही चाहा था के आकाश अपनी ज़िन्दगी के हर रंग देखे, खुश रहे, और जिस से भी उसकी शादी हो उस लड़की से उसे भरपूर प्रेम मिले, ‘मैं तो हमेशा से यही चाहती थी के आकाश की ज़िन्दगी खुशहाल रहे, उसे वो सारी  खुशियाँ मिले जिसका वो हक़दार है! फिर आज ये आंसू क्यूँ?, आरती अनगिनत सवालों में उलझ गयी!
 
दोनों में गहरी दोस्ती थी, पर आकाश आरती से प्यार करता था, जो उसने बहोत देर से बताया, हाँ आरती की शादी हो जाने के बाद, वो जनता था के ये शादी, शादी नहीं एक समझौता मात्र है! खुद को उसने रोका भी नहीं, हर मुमकिन कोशिश करता आरती को खुश रखने की, पर वो अपनी ज़िन्दगी में उलझी रहती जो एक स्याह रात के सिवाय कुछ न थी! आरती की ज़िन्दगी एक शाम की तरह थी, एक ऐसी शाम के जिसके बाद रात होना निश्चित है! सारा सच जानने के बावजूद आकाश उससे प्यार करता था, ऐसा वो कहता था, आकाश को आरती की आवाज़ में दर्द की एक झलक भी दिखती तो तड़प उठता, और उसे हंसाने की हर मुमकिन कोशिश करता, लेकिन ख़ुशी बस कुछ पल की होती, आरती फिर लौट आती उसी गहरी शाम के साए में जहाँ से समझौते का सफ़र शुरू होता! ‘आरती बस एक बार कह दो क्या तुम्हे एक पल को भी मुझसे प्यार हुआ है?’ इस सवाल का जवाब दे पाना आरती के लिए आसन न था, वो कहती, ‘हाँ, पर बस एक दोस्त की तरह!’ आरती जितनी भावुक लड़की थी उतनी ही सच्चाई का सामना करनेवाली भी, वो सच जानती थी, वो इस बात को जानती थी के आकाश एक आम इंसान है, वो प्यार तो कर सकता है पर समाज के बनाए बंधनों को तोड़ने की हिम्मत नहीं, शायद यही वो वजह थी के वो कभी खुल के अपने मन की बात न कह सकी! वो जानती थी के आकाश जबतक उस से दूर न जाएगा वो अपनी ज़िन्दगी में आगे नहीं पढ़ पाएगा, सीर्फ इसीलिए उसने खुद को आकाश की नज़रों में गिराने का फैसला किया! और कामयाब भी हो गयी! आकाश का दिल टूट गया और उसने आरती को हिकारत की नज़रों से देखा, आरती सब सहती रही, एक दिन हार कर आकाश ने आरती से हर ताल्लुक तोड़ लिए, कई महीने गुज़र गए दोनों में कोई बातचीत न हुई, पर आज? जाने क्यूँ आरती को ये बात चुभी थी के जो शक्स मुझसे प्यार करने के दावे किया करता था, उसकी शादी है ये तो मालूम है, पर ऐसा कैसे हो सका के उसने  इतने शौक से अपनी शादी का कार्ड डिज़ाइन किया?

क्या वजह थी के आकाश ने इतने दिनों बाद आरती से बात करने की कोशिश की? क्या वो उसे भूला नहीं था?
क्या वजह थी के आकाश ने वो इनविटेशन कार्ड आरती को भेजा ? क्या वो आरती के मन की थाह लेना चाहता था?
क्या वजह थी के आरती ने जब खुद को पूरी तरह इस रिश्ते से काट लिया था फिर भी आकाश के कार्ड को देख उसकी सांस सीने में अटक गयी? क्या उसे आकाश का इंतज़ार था?

कितनी अजीब बात है न, जो हमसे प्यार करे हम उसके होते भी नहीं, और उसपर अपना हक भी समझते हैं, समझदारी कहती है के शादी आँखें खोल के करनी चाहिए, जीवन का बहोत अहम् फैसला है, और मन कहता है, के उसने अपनी आँखें खोल, सबकुछ खंगाल कर कदम उठाया?

क्या है ये ज़िन्दगी, क्या हैं ये रिश्ते,
कभी खुशियों से सराबोर करते हैं, कभी आपस में उलझते!

Saturday, November 17, 2012

माँ

बुजुर्गों को हँसते हुए देख बहुत अच्छा लगता है, कभी उनसे कोई छोटा सा सवाल करो, और उसका वो बहुत लंबा सा जवाब देते हैं, उस वक़्त उनके चेहरे को देखते हुए उनकी बातें सुनना कुछ अलग सा ही महसूस होता है, माँ कहती हैं ‘अब चलते में तकलीफ होती है, घुटने में दर्द रहता है, आँखों से दीखता भी कम है’ पर जब मुझे ऑफिस आने में देर हो रही होती है तो देखते देखते मेरे लिए टिफिन बना देती हैं, सीर्फ मेरी ख़ुशी के लिए वो चौथे महले तक चढ़ मेरे घर आई, कल रात ‘रश्मिरथी’ सुना रही थी! और सुनाते वक़्त उसकी आँखों में एक खास चमक थी, जब भी माँ से पूछती हूँ, ‘माँ, बाबूजी से आपको कोई शिकायत तो नहीं?’ तो वो कहती हैं, ‘तुम्हारे बाबूजी ने मुझे तुम जैसी प्यारी बेटियाँ दी, मुझे और क्या चाहिए था!’

कितनी अजीब बात है न, एक औरत जिसका पति अठारह साल पहले जा चुका  है, वो औरत जो अपने पति को परमेश्वर की तरह पूजती थी, वो उसके बगैर अब भी जीती है, हंसती है, खुश होती है!

सच मुझे उसकी हंसी के सामने किसी भी विश्व सुंदरी की मुस्कान फीकी लगती है!

चेहरे पर झुर्रियां समेटे,
होठों पर मुस्कान बिखेरे,
हाथों की घिस गयी रेखाएं,
बालों पे सफेदी लहराए,
छोटे छोटे दर्द पे मेरे,
आँखें उसकी मोती बिखेरे,
सबसे सुन्दर सबसे प्यारी,
है वो मेरी माँ
रातों को जागा करती थी,
मेरे लिए तारे गिनती थी,
भूके पेट कई बार ही सोयी,
बाबूजी से छुप छुप कर,
खूब बताशे लाया करती थी,
दुनिया से बस अलग सी है वो
मेरी प्यारी माँ!

Friday, November 2, 2012

बस यूँ ही......

'मुझे नफरत थी;
झूठ से,
नशे से,
बेईमानी से और
क्रोध से
मुझे प्रेम था;
सत्य से,
इमानदारी से,
समर्पण से,
तुमपर हर बार यकीन किया, खुद से झूठ बोला, खुद को छला, सत्य से दूर हुई  
तुम्हारी इस कदर आदत डाल ली के तुम्हारे बगैर जीना बेमाने हो गया, कुछ कुछ तुम्हारा नशा सा,
तुम्हे जानने के बावजूद तुम्हारा इंतजार किया, खुद से बेईमानी की,
और जब कुछ न मिला तो खाली हाथ मलते खुद को देखा, खुद पर क्रोध आया!'

'तुम घिरे हो असंख्य कलियों से,
तुम्हे छू पाने की उम्मीद कुछ चाँद को तोड़ने जैसा,
तुम्हारा घर जैसे मधुबन,
और तुम हो एक सुन्दर फूल जिसकी खुशबू बसा ली है मैंने खुद में,
मेरी मृत्यु निश्चित है तुम्हारी भुजाओं में!'

'मेरे मन मेँ वो बात जो छुपी है सदियोँ सेँ, आज कह दूँ गर इजाजत दो। बात बस इतनी सी है के साथ होता जो तुम्हारा....मैँ इतनी अधूरी न होती........'

'ऐ सूरज तू कबतक अपनी किरणोँ से मुझे जलाता रहेगा, चाँद की आगोश से बार बार मुझे खीच के लाना बँद कर, सो जाने दे एक बार मुझे हमेशा के लिये.........'

'जाने क्यूँ दिल.. रस्मों रिवाजों को मानता नहीं,
जाने क्यूँ दिल.. दुनिया, इन समाजों को मानता नहीं,
जाने क्यूँ दिल.. तेरी राह तकता है आज भी,
जाने क्यूँ दिल.. अपनी रुसवाई को स्वीकारता नहीं!'