Saturday, November 24, 2012

बस यूँ ही............

'किसी को परवाह नहीं तुम्हारे सिवा मेरी,
बस एक तुम ही हो जो मुझपर नज़र रखते हो,
के जब भी उठकर जरा चलने की कोशिश करती हूँ,
फिर से एक और चोट मुझको रसीद करते हो....'
 

'ये कैसा उम्मीद का दामन थमाते हो हर बार और फ़िर खेँच लेते हो अचानक ही, रह जाती हूँ मैँ निश्प्राण सी, जबकि मैँ किसी मासूम बच्चे की तरह करती हूँ यकीन तुमपर हर बार और तुम?'

'बाहर शहनाई बज रही है जिसके गूंजने की आवाज़ आ रही है, छोटी उम्र की लड़कियां छेड़ रही हैँ दुल्हन को, जिसने ज़ेवर के साथ शर्म भी पहन रखा है, उसकी आँखोँ मेँ उम्मीद है, और अनगिनत ख़ाब हैँ, ज़रा सा ग़म भी है अपनोँ से बिछड़ने का और थोड़ी घबराहट भी । इन सारे अहसासोँ मेँ मात्र घबराहट ही स ही है बाकी बेमाने'

'उसके हाथ में अक्सर एक पत्थर पाया गया है,
हाँ मेरे नाम का पत्थर,
मुझे बताया था किसी ने,
वो जब भी कुछ लिखता है,
मेरा ज़िक्र ज़रूर करता है,
रंजिश निकालने के लिए उसने कलम का सहारा लिया है,
एक अरसे पहले कहा था मुझसे,
अब तुम्हे भुला दूंगा,
के तुम मेरे लिए मायने नहीं रखती,
तुम हो के नहीं इस से मुझे फर्क नहीं पड़ता,
क्या वाकई उसने भुला दिया मुझे?'


'

 

ये ज़िन्दगी कभी मुकममल सी लगती है...

मुझे अब भी याद है कई बार मेरे बाल खुले होते और मैं तुम्हारे पैर पर सर रखकर लेटी होती, एक बार यूँ भी हुआ के तुम अचानक ही बोल पड़े.......’तुम्हारे बाल थोड़े और लम्बे होते न तो तुम एकदम हेमा मालिनी दिखती....और जो आगे चेहरे पर एक लट होती तो बस मीना कुमारी लगती, और’......................बस इतना ही कहा था तुमने के मैं तुमसे रूठकर चली गयी थी कमरे से, और बालकनी में खड़ी हो, उस चाँद को देखने लगी थी के तुम मेर...
े पास आये और मेरा चेहरा अपनी हथेली में थाम कहा था ‘पर इस से क्या होता है...मुझे तो चाँद मिला है, जो बस एक ही था...और ये सुनते ही मैं शर्मा गयी थी, मैंने पूछा था ‘चाय पिओगे?’ तुमने किस तरह मुस्कुराते हुए कहा था, ‘हाँ, पर मैं बनाऊंगा, जब मैं तुम्हे अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाता हूँ तो बहुत अच्छा लगता है’ तुम चाय बनाने पर अक्सर जोर डाला करते थे, वजह बस इतनी थी, के चाय बाने के बाद तुम मुझे कप में नहीं बल्कि ग्लास में चाय देते थे और इतना देते थे के ख़त्म होने में वक़्त लगे, और उतने वक़्त तक मैं तुम्हारे सामने बैठी रहूँ और तुम अपनी कविताएँ सुनाते रहो...सुनाते सुनाते कई बार तुम पूछा भी करते थे ‘बोर तो नहीं हो रही न?’ और मैंने हर बार बस एक ही जवाब दिया था..........’तुमसे जुडी कोई भी बात मेरे लिए अनमोल है’

जानते हो मैंने तुमसे कभी कहा नहीं....पर अक्सर जब मैं साड़ी पहनती तो पहनने के बाद ये देखती के मेरी साड़ी का कलर तुम्हारे शर्ट के कलर से मैच कर रहा है या नहीं....तुम्हारे साथ अपने पसंद को मिलाना बड़ा अच्छा लगता था...

कई बार यूँ भी हुआ के जब आईने के सामने तुम खड़े हुए तैयार हो रहे थे और मैं तुम्हारे करीब आकार खड़ी हुई और तुमने कहा... हमदोनो की जोड़ी कितनी अच्छी लगती है न.............दुनिया की नम्बर वन जोड़ी है......................’

यादें जाने कितनी हैं,
बातें जाने कितनी हैं,

ये ज़िन्दगी कभी मुकममल  सी लगती है...
और कभी साँसों की भी कमी सी लगती है....

Thursday, November 22, 2012

बस यूँ ही.......

'नहीं मुझे तुमसे प्रेम नहीं
जो है, वो स्वार्थ मात्र था,
स्वार्थ, के तुम्हे देख सकूँ एक पूरी उम्र भर के लिए,
स्वार्थ, के भुला दूँ खुदको और हो जाऊं तुम्हारी सदा के लिए,
स्वार्थ, के तुम्हारी एक सांस की खातिर गर देनी परे जान भी तो उफ़ न करूँ,
नहीं मुझे तुमसे प्रेम नहीं
जो है, वो स्वार्थ मात्र था!'
 

'मैंने अपना सारा सामान बाँध लिया है,
तुम्हारी यादें, तुम्हारे खाब, वो सारे पल और हाँ कुछ लफ्ज़ भी तो हैं..
सबको संभाल के एक पोटली में बाँध लिया है,
के इस बार जब तुम आओगे, तो न बोलूंगी के ‘कुछ पल रुको’,
के न दूंगी तुम्हे मौका छोड़ कर के जाने का,
मेरे सामान मेरे साथ लिए, निकल पडूँगी
तुम्हारा हाथ थामे
उसी रास्ते पर के जिसकी मंजिल तुम थे तुम हो.........'


'हर नाकामयाब तजुर्बा एक नए नज़रिए को जन्म देता है.......'
 

'बदली हुई हकीक़त गुज़रा हुआ ज़माना,
 है याद आज भी वो मेरा तेरा फ़साना..........'


'कल चक्खा था तुम्हारे लफ़्ज़ों को,
थोड़े फीके से लगे मुझको,
तुम्हारी खुशबू अब और इनसे नहीं आती!'
 




 

बस यूँ ही.......

'हाँ ये मेरी आदत है,
के मैं सच से अपनी आँखें मूँद लेती हूँ,
कोई जब कहता है, के तुम खुद को धोका दे रही हो,
तो सर घुमा लेती हूँ, और सोचती हूँ के कुछ सुना ही नहीं,
मुझे प्रिय है तुम्हारी यादों में रहना,
तुम्हे सोचना,
‘सच’ की हर बूँद से नफरत है मुझे,
यूँ लगता है कभी कभी
के ज़िन्दगी एक मिली थी वो तो मैं जी चुकी,
अब क्या कर रही हूँ इस दुनिया में...'

'के नकली मुस्कान होठों पर पहने,
समाज के बनाए रिश्ते की लाश काँधे पर उठाए फिरती हूँ!
शायद एक इंतज़ार अब भी मेरे अन्दर बसता है..........'

'उसकी हिकारत भरी नज़रें भी देखी हैं,
के जिसको उम्र भर मैंने खुदा समझा है……'
 

'आज अफ़सोस नहीं मुझको तेरे जाने का,
तेरे होने से भी मेरी ज़िन्दगी बदलती नहीं,
मेरी तकदीर, मेरे बस में कहाँ थी जाना............'
 

 

Tuesday, November 20, 2012

बस यूँ ही..

ये कैसी तन्हाई काले साए के मानिंद छाई है मुझपर,
के उदासी दिल से शुरू हो अब चेहरे तक पहोच आई है,
ये चाँद एक दिन छुपता है,
तो इस आसमान को अकेलापन काटने को दौड़ता है,
और हर कोई जुट जाता है,
उसके उस अंधकार को उजाले में तब्दील करने के लिए,
पर मेरी ज़िन्दगी का अमावास कब छटेगा,
आखिर क्या है जिसका इंतज़ार ख़त्म ही नहीं होता,
खुद से सवाल कर कर के अब थक गयी हूँ,
मैं, अब मेरे दिल से घबराने लगी हूँ,
जाने कैसी जिद्द किये बैठा है,
के मुझको एक पल सुकून का ये बक्श्ता नहीं,
इसे देखते ही डर जाती हूँ,
के फिर वही उदासी की पोटली लिए आता होगा,
फिर उन्ही राहों से गुजारेगा मुझको,
फिर नज़रें धुंधलाएंगी आंसुओं से मेरी,
फिर वीरान कर के जाएगा मेरी हस्ती को............. 

Monday, November 19, 2012

क्या है ये ज़िन्दगी, क्या हैं ये रिश्ते

कुछ भी तो नहीं हुआ ,
कुछ भी तो नहीं
फिर ये अचानक मेरी आँखों के कोरों से आंसू क्यूँ छलक गए!

‘मैडम आपके लिए किसी का मेरेज कार्ड है’, पोस्टमैन ने कार्ड थमाते हुए आरती से कहा, आरती के हाथ में कार्ड आया ही था के फ़ोन की घंटी बज गयी, ‘तुम्हे कार्ड मिला? ’फ़ोन पर आकाश था, ‘जरा ठहरो, आरती बस इतना ही कह सकी, सवाल सुनते ही आरती का दिल बैठ गया, वो चुप थी, आरती ने एन्वेलप खोला और पढ़ना शुरू किया, आकाश ने खुद अपनी शादी का इनविटेशन कार्ड तैयार किया था, वो पढ़ती जा रही थी और उसका दिल बैठा जा रहा था, पढ़ने के बाद उसने आकाश से बस इतना ही कहा ‘खुश रहो हमेशा, मेरी दुआ तुम्हारे साथ है!’...........उसे मालूम भी न चला कब उसके आँख से आंसू छलक पड़े! एक पल पहले तक वो सोच रही थी के वो आकाश को भूल गई है, उसकी शादी होने वाली है ये तो वो पहले से जानती थी, ‘हाँ यही तो वो वजह थी के उसने खुद को आकाश से दूर कर लिया था, उसने तो बस इतना ही चाहा था के आकाश अपनी ज़िन्दगी के हर रंग देखे, खुश रहे, और जिस से भी उसकी शादी हो उस लड़की से उसे भरपूर प्रेम मिले, ‘मैं तो हमेशा से यही चाहती थी के आकाश की ज़िन्दगी खुशहाल रहे, उसे वो सारी  खुशियाँ मिले जिसका वो हक़दार है! फिर आज ये आंसू क्यूँ?, आरती अनगिनत सवालों में उलझ गयी!
 
दोनों में गहरी दोस्ती थी, पर आकाश आरती से प्यार करता था, जो उसने बहोत देर से बताया, हाँ आरती की शादी हो जाने के बाद, वो जनता था के ये शादी, शादी नहीं एक समझौता मात्र है! खुद को उसने रोका भी नहीं, हर मुमकिन कोशिश करता आरती को खुश रखने की, पर वो अपनी ज़िन्दगी में उलझी रहती जो एक स्याह रात के सिवाय कुछ न थी! आरती की ज़िन्दगी एक शाम की तरह थी, एक ऐसी शाम के जिसके बाद रात होना निश्चित है! सारा सच जानने के बावजूद आकाश उससे प्यार करता था, ऐसा वो कहता था, आकाश को आरती की आवाज़ में दर्द की एक झलक भी दिखती तो तड़प उठता, और उसे हंसाने की हर मुमकिन कोशिश करता, लेकिन ख़ुशी बस कुछ पल की होती, आरती फिर लौट आती उसी गहरी शाम के साए में जहाँ से समझौते का सफ़र शुरू होता! ‘आरती बस एक बार कह दो क्या तुम्हे एक पल को भी मुझसे प्यार हुआ है?’ इस सवाल का जवाब दे पाना आरती के लिए आसन न था, वो कहती, ‘हाँ, पर बस एक दोस्त की तरह!’ आरती जितनी भावुक लड़की थी उतनी ही सच्चाई का सामना करनेवाली भी, वो सच जानती थी, वो इस बात को जानती थी के आकाश एक आम इंसान है, वो प्यार तो कर सकता है पर समाज के बनाए बंधनों को तोड़ने की हिम्मत नहीं, शायद यही वो वजह थी के वो कभी खुल के अपने मन की बात न कह सकी! वो जानती थी के आकाश जबतक उस से दूर न जाएगा वो अपनी ज़िन्दगी में आगे नहीं पढ़ पाएगा, सीर्फ इसीलिए उसने खुद को आकाश की नज़रों में गिराने का फैसला किया! और कामयाब भी हो गयी! आकाश का दिल टूट गया और उसने आरती को हिकारत की नज़रों से देखा, आरती सब सहती रही, एक दिन हार कर आकाश ने आरती से हर ताल्लुक तोड़ लिए, कई महीने गुज़र गए दोनों में कोई बातचीत न हुई, पर आज? जाने क्यूँ आरती को ये बात चुभी थी के जो शक्स मुझसे प्यार करने के दावे किया करता था, उसकी शादी है ये तो मालूम है, पर ऐसा कैसे हो सका के उसने  इतने शौक से अपनी शादी का कार्ड डिज़ाइन किया?

क्या वजह थी के आकाश ने इतने दिनों बाद आरती से बात करने की कोशिश की? क्या वो उसे भूला नहीं था?
क्या वजह थी के आकाश ने वो इनविटेशन कार्ड आरती को भेजा ? क्या वो आरती के मन की थाह लेना चाहता था?
क्या वजह थी के आरती ने जब खुद को पूरी तरह इस रिश्ते से काट लिया था फिर भी आकाश के कार्ड को देख उसकी सांस सीने में अटक गयी? क्या उसे आकाश का इंतज़ार था?

कितनी अजीब बात है न, जो हमसे प्यार करे हम उसके होते भी नहीं, और उसपर अपना हक भी समझते हैं, समझदारी कहती है के शादी आँखें खोल के करनी चाहिए, जीवन का बहोत अहम् फैसला है, और मन कहता है, के उसने अपनी आँखें खोल, सबकुछ खंगाल कर कदम उठाया?

क्या है ये ज़िन्दगी, क्या हैं ये रिश्ते,
कभी खुशियों से सराबोर करते हैं, कभी आपस में उलझते!

Saturday, November 17, 2012

माँ

बुजुर्गों को हँसते हुए देख बहुत अच्छा लगता है, कभी उनसे कोई छोटा सा सवाल करो, और उसका वो बहुत लंबा सा जवाब देते हैं, उस वक़्त उनके चेहरे को देखते हुए उनकी बातें सुनना कुछ अलग सा ही महसूस होता है, माँ कहती हैं ‘अब चलते में तकलीफ होती है, घुटने में दर्द रहता है, आँखों से दीखता भी कम है’ पर जब मुझे ऑफिस आने में देर हो रही होती है तो देखते देखते मेरे लिए टिफिन बना देती हैं, सीर्फ मेरी ख़ुशी के लिए वो चौथे महले तक चढ़ मेरे घर आई, कल रात ‘रश्मिरथी’ सुना रही थी! और सुनाते वक़्त उसकी आँखों में एक खास चमक थी, जब भी माँ से पूछती हूँ, ‘माँ, बाबूजी से आपको कोई शिकायत तो नहीं?’ तो वो कहती हैं, ‘तुम्हारे बाबूजी ने मुझे तुम जैसी प्यारी बेटियाँ दी, मुझे और क्या चाहिए था!’

कितनी अजीब बात है न, एक औरत जिसका पति अठारह साल पहले जा चुका  है, वो औरत जो अपने पति को परमेश्वर की तरह पूजती थी, वो उसके बगैर अब भी जीती है, हंसती है, खुश होती है!

सच मुझे उसकी हंसी के सामने किसी भी विश्व सुंदरी की मुस्कान फीकी लगती है!

चेहरे पर झुर्रियां समेटे,
होठों पर मुस्कान बिखेरे,
हाथों की घिस गयी रेखाएं,
बालों पे सफेदी लहराए,
छोटे छोटे दर्द पे मेरे,
आँखें उसकी मोती बिखेरे,
सबसे सुन्दर सबसे प्यारी,
है वो मेरी माँ
रातों को जागा करती थी,
मेरे लिए तारे गिनती थी,
भूके पेट कई बार ही सोयी,
बाबूजी से छुप छुप कर,
खूब बताशे लाया करती थी,
दुनिया से बस अलग सी है वो
मेरी प्यारी माँ!

Friday, November 2, 2012

बस यूँ ही......

'मुझे नफरत थी;
झूठ से,
नशे से,
बेईमानी से और
क्रोध से
मुझे प्रेम था;
सत्य से,
इमानदारी से,
समर्पण से,
तुमपर हर बार यकीन किया, खुद से झूठ बोला, खुद को छला, सत्य से दूर हुई  
तुम्हारी इस कदर आदत डाल ली के तुम्हारे बगैर जीना बेमाने हो गया, कुछ कुछ तुम्हारा नशा सा,
तुम्हे जानने के बावजूद तुम्हारा इंतजार किया, खुद से बेईमानी की,
और जब कुछ न मिला तो खाली हाथ मलते खुद को देखा, खुद पर क्रोध आया!'

'तुम घिरे हो असंख्य कलियों से,
तुम्हे छू पाने की उम्मीद कुछ चाँद को तोड़ने जैसा,
तुम्हारा घर जैसे मधुबन,
और तुम हो एक सुन्दर फूल जिसकी खुशबू बसा ली है मैंने खुद में,
मेरी मृत्यु निश्चित है तुम्हारी भुजाओं में!'

'मेरे मन मेँ वो बात जो छुपी है सदियोँ सेँ, आज कह दूँ गर इजाजत दो। बात बस इतनी सी है के साथ होता जो तुम्हारा....मैँ इतनी अधूरी न होती........'

'ऐ सूरज तू कबतक अपनी किरणोँ से मुझे जलाता रहेगा, चाँद की आगोश से बार बार मुझे खीच के लाना बँद कर, सो जाने दे एक बार मुझे हमेशा के लिये.........'

'जाने क्यूँ दिल.. रस्मों रिवाजों को मानता नहीं,
जाने क्यूँ दिल.. दुनिया, इन समाजों को मानता नहीं,
जाने क्यूँ दिल.. तेरी राह तकता है आज भी,
जाने क्यूँ दिल.. अपनी रुसवाई को स्वीकारता नहीं!'
 


 

हर शख्स में कुछ बात होती है, हर रिश्ता कुछ खास होता है

वो मेरी परवाह करता था, नहीं कोई रिश्ता तो न था उससे पर फिर भी....मुझे अब भी याद है मैं जब पहली बार दिल्ली आई थी, वो रोया था, और रोते रोते उसने कहा था, ‘आप जा रही हैं मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा, और मैं मर्द का रोना गुनाह समझता हूँ, फिर भी देखिये जाने कैसे मेरी आँखों से आंसूं निकल गए आज, आपकी बहुत याद आएगी!’ हाँ तुम्हारा नाम बिलकुल उसी का नाम है....उम्र भी शायद कुछ कुछ उतनी ही, नहीं ..वो मुझसे छोटा था पूरे एक महीने, और मैं उसे इस एक महीने के अंतर कि दुहाई देती, बात बात पे कहती ‘तुम मुझसे छोटे हो’ बिलकुल मेरे छोटे...........’ और बस वो मुझे रोक देता, कहता किसी रिश्ते का नाम न दें....मेरी भावना जो आपके लिए है और आपकी भावना जो मेरे लिए है उसे बस..रहने दीजिये! वो नासमझ था, मासूम था, अब भी याद है, उसकी दीदी थी, जो मेरी दोस्त थी, वो मुझसे बड़ी थी, पर मुझे उसके साथ वक़्त गुज़ारना पसंद था, जब मैं उसकी ज़िन्दगी में आई तो वो अपने भाई को ज्यादा वक़्त न दे पाती, इस वजह से पहले पहल मेरी और उसकी बिलकुल बात चित न होती, वो मुझे पसंद न करता था, वो कमरे में आता तो बस अपने काम के लिए, और फिर जल्द ही चला जाता, मुझे बस इतना मालूम होता के वो शर्मीला है, पर अच्छा लगता.....एक दिन मैं जब उसके घर गयी तो उसकी दीदी नहीं थी, और वो मेरे लिए चाय बना कर लाया, मैंने कहा ‘यहीं बैठकर पी लो, मैं काटती नहीं हूँ, और वो हंस पड़ा, उसकी हंसी निश्छल थी, बिलकुल एक मासूम बच्चे कि तरह...और हम दोस्त बन गए, हर शाम, मैं और वो छत पर टहला करते, और वो अपनी बातों से हंसाता रहता,  उसने कहा था एक बार, मुझे आपको हँसता देखना बहोत अच्छा लगता है, हर शाम वो दो टॉफियां खरीदता और एक मुझे देता, वो उम्र न थी ऐसी के ज्यादा सोचूं, बस हँसना खेलना अच्छा लगता......मुझे एक महीने बाद ही दिल्ली शिफ्ट होना पड़ा, और वो वहीँ रह गया, और अगले कई महीने मैं वापस नहीं गयी, करीब चार महीने बाद जब गयी तो वो मिलने आया था, हर रोज़ दो टॉफियां खरीदता, एक खुद खाता और एक मेरे लिए रखता! साड़ी टॉफियां दी उसने मुझे एक साथ, उसने कुछ कहा नहीं...लेकिन मुमकिन न था उसके लिए कुछ भी छिपा पाना!

Thursday, November 1, 2012

बस यूँ ही......

'हर रिश्ता हो जाता है बासी एक दिन!
फिर खो जाती है उसकी खुशबू भी,
और रह जाते हैं चंद सूखे आसुओं की लकीर
जो बेजान आँखों के कोनों से झांकते हैं,
और याद दिलाते हैं के तुम कितने नाकाम रहे!'

'उसकी तस्वीर कुछ ऐसी बसा रक्खी है इन आँखों में,
के हर तस्वीर में अब दाग़ नज़र आते हैं!'

'एक वक़्त होता है जब सबकुछ सिर्फ ग़लत ही होता है!
हम कहना कुछ और चाहते हैं, लोग समझते कुछ और हैं,
हम करना कुछ और चाहते हैं, और होता कुछ और है!
अक्सर इसे हम एक फेज़ का नाम देते हैं,
पर शायद ये मात्र फेज़ नहीं बल्कि हमारे अंतर्मन के हालत का प्रतिबिम्ब होता है!'