Thursday, February 28, 2013

यकीन

हर बार छोड़ आती हूँ खुद को,
वहीँ...नदी के उसी किनारे पर,
जहां तुमने मुझे छोड़कर जाने का फैसला किया था,
वहीँ..उसी जगह,
जहाँ मैंने खुद को तिलतिल कर मरते हुए देखा था,
जहां पाँव मेरे जम से गए थे,
जहां दिल के दर्द ने मेरी आँखों से मोती बिखेर दिए थे,
जहां दम घुटने लगा था मेरा ये सोचकर, के तुम बेवफा कैसे हो गए!
हर बार कोशिश करती हूँ
वहीँ...नदी के उसी किनारे जाकर,
के भूल जाऊं तुम्हे, या खुद को कर दूँ इस गहरे पानी के हवाले,
कि अब और इस जिस्म का बोझ मुझसे उठता नहीं,
दिल पर पत्थर रखकर, मन को हल्का करने की कोशिश करती हूँ
और छोड़ आती हूँ खुद को वहीँ उसी जगह
नदी के किनारे
जहां तुमने मुझे छोड़कर जाने का फैसला किया था,

मेरी कलाई पकड़कर रोक लेती हैं लहरें मुझे,
थाम लेता है मेरा आँचल अपनी उँगलियों में ये बादल,
और कहती है नदी की कलकल बहती पानी...
के वो महज़ मुखौटा था तुम्हारा,
अब भी पलता है दिल में प्यार तुम्हारे मेरे नाम का,
अब भी रोते हो तुम तनहा रातों को मुझे सोचकर,

जूठी आँखें

उसने जूठी आँखों से छुआ था जिस वक़्त मुझे,
खुश्क से होंठ थे उसके,
कांपती सी उंगलियाँ,
रंग चेहरे का मगर ज़रा भी उड़ा न था,
मैंने खामोशी से गड़ा दी थी अपनी नज़रे उसपर,
और चली आई थी सर झुककर,
बस यही सोचते हुए,
क्या अपनी गलती का एहसास कभी होगा उसे!


 

Wednesday, February 20, 2013

बस यूँ ही.....

वो महज़ एक नाम है,
एक तस्वीर है,
एक आवाज़ ही तो है,
फिर ये दीवानगी कैसी?

क्या इश्क करने के लिए जिस्म का होना ज़रूरी है!
 

****

सोचा न था जीतेजी कभी ऐसा मकाम भी आएगा,
हर एक पल जीवन का जब दिनचर्या बनके रह जाएगा,
प्यार, ख़ुशी, सुकून को दिल इस क़दर तरस जाएगा,
ये सब एहसास मेरे लिए एक शब्द बनके रह जाएगा.....
 

****

वक़्त के साथ उसको भी बदलते देखा,
ज़िन्दगी तुझमें जाने हमने क्या देखा....

Saturday, February 16, 2013

बस यूँ ही......

एक हसीं ख्वाब है ज़िन्दगी,
या हकीक़त की राख है ज़िन्दगी!
खिलखिलाती सुबह है ज़िन्दगी,
या काली सियाह रात है ज़िन्दगी,
गलियों का मोड़ है ज़िन्दगी,
या मंजिल का इंतज़ार है ज़िन्दगी!
बहारों का आस है ज़िन्दगी,
या पतझड़ का फूल है ज़िन्दगी,
अपनों का साथ है ज़िन्दगी,
या तन्हाई का एहसास है ज़िन्दगी
 

Wednesday, February 6, 2013

ममता की मूर्ति मेरी मासी.....

ऑफिस में करीब पूरे दिन ही अपने डेस्क पर बैठे रहने की आदत उसकी, सिर्फ लंच टाइम में ही अपनी सीट छोडती, और फिर लौटकर अपनी सीट पर बैठ जाती, न किसी से बात चित न ही कुछ और, घर से ऑफिस और ऑफिस से घर, बस इतनी ही दूर थी ज़िन्दगी उसकी, उस रोज़ लंच टाइम में भी उसने डेस्क नहीं छोड़ा, वहीँ अपनी सीट पर बैठी ब्रेक में इन्टरनेट पे चंद नज्में पढ़ती रही, फिर जाने क्या सोचकर मोबाइल हाथ में उठाया, शायद कोई नंबर डायल करना था उसे, उसने मोबाइल हाथ में लिया और जैसे ही ऊँगली नंबर सर्च करते हुए ‘एम्’ लेटर पर पड़ा, उसकी ऊँगली कांपने लगी, और पलकों से आंसू छलक पड़े..मोबाइल साइड में रख अपने आंसू पोंछ, वो सोचने लगी, के अब इस मोबाइल नंबर का क्या करुँगी! अब तो उनसे बात कभी न होगी, वो नहीं..कहीं नहीं इस दुनिया में अब

शादी हो के नयी नयी ससुराल में आई थी, पति से ज्यादा सास प्यार करनेवाली मिली, और उनसे भी ज्यादा सांस की बड़ी बहन, उन्होंने कभी उसे अपनी बहु नहीं माना, बेटी का दर्ज़ा दिया. शादी उसके पति ने घरवालों के खिलाफ जाकर किया था, इसलिए सबका नाराज़ होना लाज़मी थालेकिन नीलिमा को आश्चर्य तब हुआ जब वो पहली बार ससुराल गई और सबने उसका खुले दिल से स्वागत किया सब से मिलवाने के बाद शेखर की माँ अपनी बहू को लेकर अपनी बड़ी बहन के घर गयीं, जहाँ नीलिमा का पहले से ही इंतज़ार हो रहा था, नीलिमा की सूरत देखते ही उन्होंने कहा के कहाँ से ले आई हो ये चाँद का टुकड़ा? उसकी नज़र उतारी और फिर वक़्त कैसे गुज़रा इसका पता किसी को न चला, नीलिमा बेहद खुश थी...सब अच्छे लगते थे उसे, लेकिन सबसे ज्यादा प्यार उसे शेखर की मासी से था, वजह शायद ये रहा हो के उनसे जो अपनापन मिला उसे वो उसे अपनी माँ की याद दिलाता था करीब छह महीने गुज़रे थे शादी को कि अचानक ही शेखर ने एक दिन दफ्तर से आकर कहा, ‘नीलू...बड़ी मासी को कैंसर हो गया है” नीलिमा के मानो पैरों तले ज़मीन निकल गयी.. नीलिमा स्तब्ध सी शेखर को देखती रही और बस इतना ही कह पायी, ’कैंसर???’....... मुझे यहाँ से ले चलो शेखर’ शेखर को अटपटा लगा, कि जो मासी इस हद तक नीलू को चाहती हैं और नीलू भी उन्हें एक बेटी की तरह प्यार करती है..आखिर उनकी बिमारी का नाम सुनकर, वो चले जाने की बात क्यूँ कर रही है..... शेखर ने कुछ कहा नहीं, कुछ ही दिनों में शेखर ट्रान्सफर लेकर दिल्ली आ गया और नीलू ने भी एक नौकरी ज्वाइन कर ली, वो हंसती बोलती लेकिन मन ही मन जैसे किसी शंका से पीड़ित थी...इतनी दूर आने के बाद बस एक ही सहारा बचा था नीलू के लिए...मोबाइल पे मासी की ममता भरी आवाज़ सुनना...सब नाराज़ थे नीलू के रवैये को लेकर..पर शेखर अब भी समझने की कोशिश कर रहा था, ‘आखिर इतनी संवेदनशील लड़की, ऐसी बिमारी का नाम सुनकर, वो भी ऐसे अजीज़ को, जिसे वो ऑलमोस्ट अपनी माँ की तरह मानती थी, छोड़ के कैसे आ सकती है!’ हज़ार बार सोचकर भी शेखर की हिम्मत न पड़ी के वो पूछ सके नीलू से कुछ भी, नीलिमा ने खुद को इस कदर काम में व्यस्त कर लिया के देखनेवालों को लगता इसे सोचने की भी फुर्सत न होगी....लेकिन क्या काम की व्यस्तता, सोच को रोक सकती है, वो अन्दर ही अन्दर घुलती रहती, क्या सोचती..इसकी थाह शेखर को भी न लगती...जनवरी का महिना था, दिल्ली में ठण्ड काफी बढ़ गयी थी, हर रोज़ का एक ही रूटीन, घर आने के बाद जल्दी जल्दी डिनर बनाके वो सोफे पर बैठ टीवी ऑन कर लेती, वजह शायद ये थी कि शेखर जब आए तो उस से बात न करनी पड़े...आखिर एक दिन शेखर ने पूछ ही लिया, ‘तुम्हे याद भी है आखिरी बार तुमने मुझसे मुस्कुराकर बात कब की थी?, नीलिमा ने अगले ही लाइन में जवाब दिया, ‘तो किसी बात करनेवाली को ढूंढ लो, मुझे छोड़ क्यूँ नहीं देते?’ शेखर स्तब्ध रह गया, फिर कुछ दिन दोनों में बातचीत बंद रही, एक रोज़ घर पहुचते ही शेखर ने कहा, ‘मासी अब बोल भी नहीं पा रही’ नीलिमा के हाथ से पतीला छूट गया, वहीँ दिवार से लग कर फूट फूटकर रोने लगी, शेखर ने पूछा ‘क्या हुआ? रोने क्यूँ लगी?’ मुझे अभी ले चलो शेखर मासी के पास, इसी वक़्त’ नीलिमा ने बस इतना ही कहा और रोने लगी, शेखर ने आश्वासन देते हुए कहा, मैं कल सुबह ही टिकट कटवाता हूँ, तुम रो मत नीलू, मैं हूँ न? मैं ले चलूँगा तुम्हे, कल सुबह ही चलेगे रात कैसे गुजरी दोनों को होश न था, वहीँ शेखर के काँधे पर सर रख नीलू रोते रोते कब सो गयी, उसे खुद भी मालूम न पड़ा...

सुबह के कोई साढ़े सात बजे थे नीलिमा घर के काम ख़त्म कर रही थी, और यही सोच रही थी, कि ‘कल सुबह मासी मेरे सामने होंगी, वो कितनी खुश होंगी, मैं लिपट जाउंगी उनसे, और कह दूंगी के मासी मैं आपको छोड़कर नहीं जाना चाहती थी, सिर्फ इसलिए चली गयी कि मुझे लगता था मेरी वजह से आपको ये बिमारी हुई, मेरे पापा भी मुझे छोड़ गए जब मेरी उम्र बहुत कम थी, तब से डरती थी के मेरा साया जिसपर भी पड़ेगा उसे कुछ न कुछ हो जाएगा, और फिर आपकी बिमारी का सुनकर डर गयी थी, मैं आपको खोना नहीं चाहती थी मासी, इसीलिए चली गयी थी, मैं उनसे कहूँगी के मुझे उनसे कितना प्यार है...अब छोकर कभी न जाउंगी, और आपको भी कहीं न जाने दूंगी, मैं कितनी बेवकूफ थी, के इतने महीने गँवा दिए’, नीलिमा की सोच बहुत गहरी हो चुकी थी’, उसने जाने कब तय कर लिया था कि मासी बिलकुल ठीक हैं, वो हमेशा उसके साथ ही रहेंगी, ठीक वैसे जैसे कभी उसने पिताजी के लिए तय किया था, अपनी ही धुन में नीलिमा सोचे जा रही थी। शेखर लिविग रूम में बैठा इन्टरनेट पे टिकेट बुक कर रहा था, और बस इतना ही कह सका था, ‘ठीक दो बजे की ट्रेन है नीलू, टिकेट बुक हो गया।’ कि अचानक ही शेखर के मोबाइल पर रिंग होने की आवाज़ आई, शेखर की माँ का फ़ोन था फ़ोन उठाते ही शेखर की माँ की रोने की आवाज़ आई और शेखर ने नीलू से कहा, ‘नीलू......मासी नहीं रही..’ नीलिमा की आँखों के आगे जैसे अँधेरा सा छा गया, न आंसू ही निकले और न कोई शब्द....शेखर ने नीलिमा को सहारा देने की कोशिश की, नीलिमा ने दूर से ही रोक दिया, वो खामोश थी, शेखर जनता था नीलिमा दर्द में है, बेहद दर्द में, उसने उस शख्स को खो दिया है जिस से वो बेहद प्यार करती थी, जिसकी ममता के आगे उसे शेखर का प्यार भी फीका लगता था, शेखर आवाज़ देता रहा, पर नीलिमा ने कुछ न कहा, नीलिमा को एक बार फिर महसूस हो रहा था जैसे उसके सर पर से ममता का साया उठ गया है, वो तेज़ भेदती हुई धूप में खड़ी है....अब उसे एक ऐसा सफ़र तय करना है जिसमें कोई ऐसा न होगा जिसके आँचल के तले वो सुकून से सो पायेगी..................
“खामोशी की तस्वीर थी, या अनबुझ सी पहेली कोई,
दर्द का दरिया थी वो, या तन्हाई की सहेली कोई...”

Saturday, February 2, 2013

बस यूँ ही........

क्या मेरे 'होने' का आभास नहीं उसको?
क्या मेरे जाने का कोई ग़म नहीं उसको?
क्या उसकी ग़ज़लों के अशआर मेरे लिए नहीं?
क्या मेरे दिल के छाले उसके दिए नहीं?
क्या मेरे आंगन के फूलों में जो महक सी है ... वो उसकी नहीं?
क्या मेरी आँखों में जो गुंथे हुए से ख्वाब है...वो भी उसके नहीं??
 

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हर दफ़े तुमको थोड़ा और जाना है मैँने, हर दफ़े तुम थोड़े और क़रीब आये हो मेरे दिल के, हर दफ़े इश्क़ थोड़ा और बढ़ गया है तुमसे। पहले तुमसे आकर्शित हुयी फ़िर तुम्हारी आदत हुयी फ़िर तुम्हारा सम्मान किया, आख़िर तुमसे प्यार हुआ।

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खामोशियों का एक दौड़ सा चला हो जैसे
मैंने फिर से तुझे याद किया हो जैसे,
शाख टूटे न सही दिल तो मेरा टूटा है,
अपने रिश्ते में कोई सलवट सी पड़ी हो जैसे,
मेरी तकदीर के लिक्खे को मिटा कर देखो,
धुंधली ही सही, तेरी तस्वीर बनी हो जैसे।
 

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न उम्मीद करूँ तुमसे...यही बेहतर है, कि तुमसे कीये हुये हर उम्मीद का किया है मैने भुगतान क़िश्तोँ मेँ....चंद धड़कने लुटाकर, चंद साँसे गंवाकर कभी ख़ुद को भुलाकर.........

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तुमने अनगिनत उपहार दिए मुझे,
कभी प्रशंसा के रूप में, और कभी निंदा के रूप में,
पर मैंने न कभी तुम्हारी प्रशंसा को ग्रहण किया और न निंदा को,
वो तुम्हारी आँखें ही थी जो मासूम थी, निश्छल थी..
मैं तुमसे प्रेम करने पर विवश हो गयी,
वो तुम्हारा लहजा ही था..जो कोमल था, अपनत्व का एहसास था जिसमें,
मैं खुद को समर्पित करने पर विवश हो गयी,
ये तुम्हारी आँखें ही है...ये तुम्हारा लहजा ही है,
जो मुझे तुमसे दूर किये जा रहा है,
मत बदलो खुद को.....इस हद तक......