Thursday, March 21, 2013

एक मुट्ठी रेत

कभी बहुत छोटी सी होती है बात,
और मिल जाती है तसल्ली दिल को,
कुछ कदम चल कर, रुक जाते हैं हम,
बाँध लेते हैं खुद को अपनी हदों में,
फिर खुद ही खोलते हैं कुछ गिरहें 
और जी लेते हैं दो पल,
भर लेते हैं सांस थोड़ी सीने में,
जैसे छोटा सा बच्चा कोई
भर लेता है एक मुट्ठी रेत...

मेरा चौथे माहले का घर

मेरे चौथे माहले के घर के ठीक सामने से,
एक सड़क जाती है,
दूर बहुत दूर.........
मैं अक्सर देखा करती हूँ,
आते जाते लोगों को,
दौड़ते भागते बच्चों को,
कभी पीठ पर बोझ बसते का लिए
कभी होठों पर हंसी की फुहारे लिए,
सुबह से शाम दफ्तर में गुज़ार कर,
दिल से अकेलेपन का बोझ उतारकर,
लौट आती हूँ अपने घर,
आँखों में कोई इंतज़ार या चाह नहीं होती,
फिर भी बैठी होती हूँ अपनी इस तन्हाई के साथ,
और देखती हूँ,
पौधों में खिल आए फूलों को,
थक हार कर डूबते सूरज को,
खेलते खिलखिलाते बच्चों को,
और देखती हूँ उस सड़क को,
वो सड़क के जिसके दामन में अनगिनत यादों ने रस्ते बनाए थे कभी,
वो सड़क जिसका दामन थामे मैं चली आती थी उस मोड़ पर,
जहां होते थे तुम मेरा इंतज़ार करते,
अपने छत पर खड़े,
और नज़रे टिकी रहती थी,
गली के उस मोड़ पर जहां से आती थी मैं,
इंतज़ार तुम करते पहरों,
बस उस एक लम्हे का,
जब मैं गुजरती ठीक तुम्हारे घर के सामने से,
जब मैं एक बार नज़रे उठाकर देखती तुम्हे,
तो देखती कि किस तरह ख़ुशी की लहर तुम्हारे चेहरे पर बिखर गयी है,
जिसे देख हो जाती थी मैं शर्मसार,
तुम्हारे मुस्कुरा भर देने से, उम्मीदों की लहर सी दौड़ जाती थी,
तुम जो छू लेते तो ज़िन्दगी जाने क्या होती..............
उस सड़क ने दी थी गवाही बरसों हमारे प्यार की,
ठीक उस रोज़ तक कि जबतक मुझे मालूम न था,
कि एकतरफा प्यार बंद मुट्ठी में क़ैद रेत की तरह है,

अब नहीं जाती कोई सड़क तुम्हारे घर तक,
अब नही होती कोई उम्मीद दिल में,
जिसे तुम तोड़ सको...
तुम्हारा प्यार एक भ्रम था सिर्फ एक भ्रम
जिसने मुझे तुमसे जोड़े रखा,
बांधे रखा मुझे आस के धागे से,
इंतज़ार तब भी था, दिन के ढलने का,
इंतज़ार अब भी है दिन के ढलने का,
फर्क सिर्फ इतना है,
कल इन आँखों में ख्वाब थे,
आज तन्हाई है,
और मैं नितांत अकेली हूँ...

Friday, March 8, 2013

बहिष्कार

कोई कैसे कर देता है बहिष्कार
उन यादों का,
जो बनती है पल पल को जोड़ के,
उस प्रेम का,
जो होती है धीरे धीरे... एहसासों के उगने से,
जो फलती हैं,
लम्हों की सिचाई से,
कोई कैसे कर देता है बहिष्कार,
उस शख्स का,
जो मान बैठता है आपको अपना सबकुछ,
जिसकी हर आती जाती सांस में बसे होते हैं आप,
जो सबसे दूर हो जाता है,
सिर्फ एक आपका साथ पाने के लिए,

कोई कैसे कर देता है बहिष्कार!

Thursday, March 7, 2013

फुर्सत नहीं

नहीं..ऐसी कोई मसरूफियत नहीं,
बस फुर्सत नहीं रहती कि कुछ सोच सकूँ,
गुमसुम सी आँखें टिकी रहती हैं छत पे,
जागती आँखों में भी कोई ख्वाब पलते नहीं,
मुझे दिन भर कोई काम नहीं, पर जाने क्यूँ आराम नहीं,
गुज़रे पलों के साए में कब सुबह होती है, कब शाम...मालूम नहीं!
हाँ कभी कभी एक पल चुरा लेती हूँ, खुद से ही,
और सोचती हूँ कि सोचूं कुछ तुम्हारे बारे में, कुछ मेरे बारे में,
पर जाने क्यूँ अब भी ‘मैं-तुम’ नहीं होता मुझसे,
हम दोनों अब भी ‘हम’ ही हैं,
जब भी जरा सा अपने बारे में सोचने बैठती हूँ,
तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा भर जाता है मेरी आँखों में,
कहो तो जरा? तुम मुझसे जुदा हो सके क्या?
आज भी अपने बदन में तुम्हारी खुशबू पाती हूँ,
आज भी देर रात बालकनी में खड़े खुद अपनी राह तकती हूँ,
आज भी मुस्कान बिखर जाती है होठों पर जब कोई लेता है नाम तुम्हारा,
आज भी हर सांस के साथ सीने में भर जाते हो तुम
और चल पड़ती है ज़िन्दगी कुछ और कदम, बेफिक्र सी,
मैं जानती हूँ मेरी आँखों में अब कोई ख्वाब नहीं,
पर क्या तुम जानते हो कि मेरी आँखों में तुम्हारी यादों के सिवा कुछ भी नहीं...
हाँ मुझे फुर्सत नहीं कि कुछ सोच सकूँ,
कि एक तुमने काबू कर रखा है मेरी हर सोच पर, मेरी हर याद पर, मेरी हर सांस पर............

Wednesday, March 6, 2013

तलाश

सिर्फ एक उसकी तलाश थी लेकिन,
आज लौटी हूँ खाली हाथ लिए,
खून के साथ जिस्म भी बह गया शायद,
एक बस उसकी तलाश करते हुए.
 



तुम बिन

मैंने जब से ऊँगली छुड़ा ली है कलम से,
मेरे दिन रात में सुकून का डेरा है,
न मन में बेचैनी ही बची अब,
न साँसों में तन्हाइयों का बसेरा है,
हाँ एक टीस सी उठती है कभी कभी,
कि तुझ तक अपने दिल की बात पंहुचा नहीं सकती,
आँख जो भर आती है तेरी याद में कभी कभी,
उनको तेरे दामन पर छलका नहीं सकती,

खैर कोई बात नहीं, यूँ भी एक बार कर के देखेंगे,
तूने भुला रखा है जिस तरह से हमको, हम भी तुझको भुला के देखेंगे..
दर्द से रिश्ता निभाते रहे बरसों,
जीने की आरजू में तिलतिल के मरते रहे बरसों,
अब मरने की तमन्ना में हम एक बार जी के देखंगे,
तूने भुला रखा है जिस तरह से हमको, हम भी तुझको भुला के देखेंगे..

Monday, March 4, 2013

रिश्ते की सीलन

पति पत्नी के रिश्ते से कोसों दूर,
अजनबियों सा रिश्ता निभा रहे थे,
मैं उनको भुला रही थी, वो मुझको भुला रहे थे,
अजब कशमकश में थी ज़िन्दगी, जाने क्यूँ जिए जा रहे थे,
मैं उनको मना रही थी, वो मुझको रुला रहे थे,
न प्यार था न कोई आरजू न ग़म न ख़ुशी,
सुनी आँखों से फिर भी जाने क्यूँ मुस्कुरा रहे थे,
अब सोचें भी तो डर जाते हैं जाने कैसे निभा रहे थे,
जाने अनजाने शायद एक दूजे को झेले जा रहे थे,
इस रिश्ते का टूटना तो पहले दिन से निश्चित था,
जाने क्या दिल में था जो कांचो को जोड़े जा रहे थे