Tuesday, April 30, 2013

आज मुझे ग़म नहीं.....


मैंने आज अपनी परछाई देखी...तुम्हारे घर में,
देखो न..वो भी तुम बिन रह नहीं सकती,
कितना प्यार करती है तुमसे,
मैंने देखा उसकी आँखों में,
ढेर सारा प्यार सिर्फ तुम्हारे लिए,
उसकी आँखों की सच्चाई,
और होठों पर निश्छल मुस्कान,
जब वो सोती है तुम्हारी बाहों में,
और देखते हो तुम उसे प्यार भरी नज़रों से,
तो दिल भर आता है मेरा,

आज इस दिल में छुपा लिया है मैंने,
तुमदोनो के उस ख़ास लम्हे को,
आज मुझे ग़म नहीं तुमसे जुदा होने का,
कि मुझ सा प्यार देने वाली आज तुम्हारे पास है,
हाँ वो तुम्हारी बेटी ज़रूर है, पर हमारा ख्वाब है....

Friday, April 12, 2013

अंतिम यात्रा


मैं जानती थी,
वो नाव डूबनेवाली थी,
नाव में पानी भरने लगा था,
दूर तक अँधेरा था,
आगे गहरा समंदर,
फिर भी मुझे आना ही था,
नाविक का हाथ थामकर,
बहती धारा के साथ मुझे बहना ही था,
उस नाव के नाविक तुम जो थे...

सुना है ज़िन्दगी कभी मौत के बाद भी मिला करती है!

Thursday, April 11, 2013

तुम

तुम उतने आसन नहीं...जितने नज़र आते हो.
खामोश तो हो...पर अनगिनत उलझनों से घिरे हो,
मुस्कुराते भी हो तो सिर्फ रस्म निभाने के लिए,
साथ चलते हो फिर भी तनहा अकेले से रहते हो,
तुम कुछ कहते नहीं...पर आँखें तुम्हारी, चुप रहती नहीं...
ग़ज़ब है तुम्हारी अदा भी...कि क़त्ल हो जाए कोई तुम्हारे हाथों..
और तुम्हारा भोला चेहरा देखकर खुद ही अपनी गवाही से मुकर जाए....

Saturday, April 6, 2013

मेरी एक और दुनिया है............

मैंने एक बात छुपायी है तुमसे,
आज कहती हूँ,
मेरी एक और दुनिया है,
जहां रहते हैं हमदोनो साथ,
हर रात तुम ऊँगली फेरते हो मेरे बालों में,
हर सुबह उठकर सबसे पहले मैं देखती हूँ तुम्हारे चाँद से चेहरे को,
और कहती हूँ ‘मेरे ‘जी’ उठिए अब, सुबह हो गयी,
तुम कहते हो, बस कुछ देर और..........
मैं जाने को होती हूँ तो तुम झट से थाम लेते हो हाथ मेरा,
रोक लेते हो...कहते हो बस कुछ देर और यूँही बैठी रहो मेरे पास,
सुबह तुम्हारे दफ्तर जाने के बाद मैं मुन्ने के साथ दिल बहलाती हूँ,
उसने हमारे प्यार को साकार कर दिया,
उसका नाम हमदोनो ने मिलकर रखा है, ‘साकार’
उसके बाल ठीक तुम जैसे हैं,
वो सांवला सा चेहरा और ज़िन्दगी सी आँखें,
सुबह से शाम हमदोनो करते हैं तुम्हारे लौट आने का इंतज़ार
हर शाम तुम्हारे लौट आने से मेरे मन में दिवाली की सी खुशियाँ होती हैं,
हर सुबह मेरी सिन्दूरी, हर मौसम फागुन सा है....
मेरी एक और दुनिया है............

Monday, April 1, 2013

ज़िन्दगी हर बार आखिरी सीढ़ी से फिसलती रही

"बुझे हुए दिल से एक आह सी निकली है.......
यूँ लगता है जैसे देखते देखते हम लुट गए,
और अफ़सोस करने का वक़्त भी न मिला,
रोने लगे तो जैसे आंसू सूख गए,
चीखना चाहे तो आवाज़ न निकली,
चलना चाहे तो पाँव काट दिए किसी ने,
मरना चाहे तो मौत भी न आई........."

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“ज़िन्दगी हर बार आखिरी सीढ़ी से फिसलती रही,
तमाम उम्र मैं ज़िन्दगी का सिर्फ इंतज़ार करती रही”

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“ऐ दोस्त हाथों की लकीरें कभी मिटती नहीं,
लाख चाहो...किस्मत बस यूँ ही बदलती नहीं,
मेरे साथ जाने कैसे हर बार ये हादसा हुआ,
बनती सी किस्मत की लकीरों को बारिश की बूंदों से मिटते देखा....”

प्यार कभी मरता नहीं!!

“प्यार कभी मरता नहीं...
मरते हैं हम...”
हाँ ये पंक्तियाँ कई बार सुनी है...
पर जो पाया वो था ठीक विपरीत...
 
एक ही राह से गुजरते रहे,
हर सुबह एक ही सूरज की रौशनी पड़ती रही हमारे चेहरों पर,
हर शाम एक ही चाँद की शीतल छाया हमदोनो को छू कर गुजरती रही,
चलते फिरते कई बार देखा भी एक दूसरे को,
बातें भी की, हाल भी पूछा,
सबकुछ तो रहा, फिर भी जाने क्यूँ ,
हमारे बीच बची थी तो सिर्फ यादें,
यादें! जो जाने कब का दम तोड़ चुकी थी,
यादें.....जिनकी लाश अब भी ढोएँ जा रहे थे हमदोनो,

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खुद को दर्द की सजा सुनाई है हर बार,
जब जब दुआओं में तेरे लिए ख़ुशी
और अपने लिए तेरी सारी बलाएं मांगी हैं मैंने.......
तुझको अपना हाथ छुड़ाकर जाते देखा है हर बार,
जब जब तेरे रास्ते के कांटे हटाने की कोशिश की मैंने,
तुझको मुस्कुराकर सजा सुनाते पाया है हर बार,
जब जब तेरी खुशियों की खातिर..
खामोशी को अपना साथी बनाया है मैंने,
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