Friday, May 31, 2013

तन्हाई...............प्यार

मन जैसे खोखला सा हो चला था,
दर्द हर पल दिल में उमरता, फिर बुझ जाता,
आँखें सूनी, कुछ ऐसी जैसे सूखा कुआं हो कोई,
सांस जो जाती थी, सो लौटकर आती न थी,
दिल की धडकनें न बढ़ती थी, न घटती ही थी,
अन्दर ही अन्दर जैसे पत्थर सी हो गई थी मैं,
अजब थी तन्हाई, जो न जाती थी, न थमती ही थी,
सच.....अजब थी तन्हाई!
और…. तुम आ गए,
तुम्हारा आना बस पल भर का,
कर गया मुझको जिंदा,
भर गया मुझमें सांसें….

देखो आज मैं पूरी हो गयी.

शायद

न शेर पढ़ती हूँ,
न ग़ज़ल कहती हूँ,
फिर भी न जाने क्यूँ,
हर पल, हरदम मुस्कुराती हूँ,
शायद तुम्हे सोचती हूँ,

शायद तुम्हे चाहती हूँ.....

Thursday, May 23, 2013

हदें

मुझको मेरी हदों के अब पार जाना है,
मुश्किल है मगर, इस बार जाना है,
दर्द दिल का अब आँखों से उतर जाएगा,
तुम पास ही बैठे रहो, ये वक़्त गुज़र जाएगा,
रूठी सी ज़िन्दगी है, जिसको मनाना है,
मुझको मेरी हदों के अब पार जाना है..

तन्हाई थी, बेबसी थी, मुस्कान को तरसे थे,
उन दिनों बिन मौसम ही सावन बरसे थे,
आँखों से आंसुओं का रिश्ता पुराना है,
मुझको मेरी हदों के अब पार जाना है..

‘रिश्ता’ हदों में बंधकर, रिश्ता नहीं रहता,
अपना ही घर कभी फिर अपना नहीं लगता,
इन सरहदों के पार मुझे घर बसाना है
मुझको मेरी हदों के अब पार जाना है...

Wednesday, May 15, 2013

सिर्फ तुम


सफ़ेद दुधिया से रंग के कागज़ को हाथ में थामे हुए,
आँखों में तुम्हारा चेहरा, होठों पे मुस्कान सजाए हुए,
खुशबुओं के रंग से खुद को सजाती रही,
पहरों वो घडी याद आती रही,

तुम्हे लफ़्ज़ों में पिरोने की ख्वाइश लिए,
कलम होंठ में दबाए, एक अनजान से धुन पर,
न जाने कितनी देर तक झूमती रही,
मैं सिर्फ तुम्हे सोचती रही,

जाने अनजाने रस्तों पर चलकर,
बार बार पीछे की ओर मुरकर,
हर राह में तन्हाई से जूझती रही,
बरसों सिर्फ तुम्हे ढूंढती रही.......

Friday, May 10, 2013

मेरी डायरी के कई पन्ने अबतक खाली हैं


“इस ठहरी हुई ज़िन्दगी से ज्यादा दिलचस्प तब थी ज़िन्दगी,
कि जब बीच भंवर में भटक रही थी कहीं,
एक वजह थी जीने की तब,
एक उम्मीद थी तुम्हे पाने की तब”

“जाने कितनी ही यादों को पिरोकर बनाया था वो रिश्ता हमने,
जाने कितनी ही गलियों में ढूँढा था एक बसेरा हमने,
जाने कितने ही तारे गवाह थे हमारे उस मासूम इश्क के,
जाने कितने ही ग़मों को छोड़ा था तब तनहा हमने,
बेहिसाब ग़म हमारी दहलीज़ तक आते थे लौट जाते थे,
तमाम शब्.... बस दस्तक वो दिया करती थी,
तुम्हारा साथ जैसे ज़िन्दगी मिली मुझको,
तुम्हारे बिन तो जैसे मौत आ गयी मुझको..
जाने कितनी ही बातें लिखी और मिटा डाली,
न तुम आये, न ज़िन्दगी न ख़ुशी न सुकून....

मेरी डायरी के कई पन्ने अबतक खाली हैं.............”

Tuesday, May 7, 2013

कौन है राजकुमार कौन है राक्षस?

माँ याद है? तुम जब परियों की कहानियाँ सुनाया करती थी, तो अंत में अक्सर कहा करती थी ‘भूरी आँखों वालों का भरोसा न करना, वो धोकेबाज होते हैं’ तुम्हारी कहानी में अक्सर जो राक्षस होते थे, उनकी आँखें भूरी होती थीं..और राजकुमार खूबसूरत, काली आँखों वाला...

तुम्हारी हर कहानी तुम्हारी हर सीख इस ‘वक़्त’ के आगे झूठी पर गयी...जानती हो माँ मेरी उन दोस्तों की ज़िन्दगी से खिलवार करने वाले ‘जिनमें से कोई तेईस साल की थी तो कोई महज़ चार साल की....किसी ने आने वाली ज़िन्दगी के लिए हसीं ख्वाब पिरोये थे, तो कोई अभी ज़िन्दगी के मायने भी नहीं जानती थी’, उनके कातिल की कोई पहचान नहीं है.. किसी में पिता का चेहरा था, तो कोई भाई के भेस में आया था, किसी ने चाचा का रूप धरा था तो कोई ताऊ बन बैठा था...
ये कैसी भूख है इन लोगों की जो सबकुछ भूल बैठे हैं, अब कैसे पहचानू माँ? कौन है राजकुमार कौन है राक्षस?

हर रिश्ते का मज़ाक उड़ाया, हर एहसास को कुचला है,
जोगी सा वो भेस बनाए, सबके घर में घुसता है,
दर्द से जब कराहती है नारी, तो दिल में वो खुश होता है,
ये कैसा संसार है बोलो माँ ये कैसा संसार?

Monday, May 6, 2013

तुम्हारे पास मौक़ा था....


तुम्हारे पास मौक़ा था,
तबतक..जबतक,
मेरे दिल की धडकनें तुम्हारी आवाज़ सुनकर बेकाबू हो जाया करती थी,
तुम्हारा ज़िक्र कोई हो, तो बेचैनी और भी बढ़ जाया करती थी,
लोगों की भीड़ में भी तन्हाई महसूस करती थी,
और हर सुबह हर शाम तुम्हारा इंतज़ार करती थी..

तुम्हारे पास मौक़ा था, तबतक मुझे पाने का, मुझसे रूठने का, मुझे मनाने का,
तुम्हारे पास मौक़ा था, मुझे ख्वाबों में भी लाने का,
मेरी उलझी लटों को सुलझाने का,
मेरे और करीब आने का,
तुम मुझे हर जन्म में स्विक्रिय थे,
हर रूप हर रंग में स्विक्रिय थे..

पर अब नहीं....
पर अब नहीं कि अब मैं कुछ भी महसूस करती नहीं,
तन्हाई और भीड़ में भी कोई फर्क महसूस करती नहीं,
मेरे दिल की दहलीज़ बहुत पहले ही तुम लांघ चुके हो,
तुम बेवफा हो ये अब तुम भी स्वीकार चुके हो...