Wednesday, May 15, 2013

सिर्फ तुम


सफ़ेद दुधिया से रंग के कागज़ को हाथ में थामे हुए,
आँखों में तुम्हारा चेहरा, होठों पे मुस्कान सजाए हुए,
खुशबुओं के रंग से खुद को सजाती रही,
पहरों वो घडी याद आती रही,

तुम्हे लफ़्ज़ों में पिरोने की ख्वाइश लिए,
कलम होंठ में दबाए, एक अनजान से धुन पर,
न जाने कितनी देर तक झूमती रही,
मैं सिर्फ तुम्हे सोचती रही,

जाने अनजाने रस्तों पर चलकर,
बार बार पीछे की ओर मुरकर,
हर राह में तन्हाई से जूझती रही,
बरसों सिर्फ तुम्हे ढूंढती रही.......

16 comments:

  1. जाने अनजाने रस्तों पर चलकर,
    बार बार पीछे की ओर मुरकर,
    हर राह में तन्हाई से जूझती रही,
    बरसों सिर्फ तुम्हे ढूंढती रही.......

    ....बहुत खूब! सुन्दर भावपूर्ण रचना...

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  2. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए कल 20/05/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    धन्यवाद!

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    1. बहुत शुक्रिया यशवंत जी

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  3. मेरी ज़िन्दगी के मायने....
    सिर्फ तुम!!!


    अनु

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    1. शुक्रिया धीरेन्द्र जी

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  5. बहुत बेहतरीन......

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    1. जी बहुत शुक्रिया रंजना वर्मा जी

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  6. बहुत बेहतरीन .....

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  7. Replies
    1. शुक्रिया मन्टू कुमार जी

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  8. Improvement hai. Asti kashchit wak vishesham....... RD

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