Monday, October 21, 2013

वो गली

वो गली एक भटकाव है, किसी का मज़ार है, गहरा कुआं है
दरिया आंसुओं का, इक चीख , इक पुकार है,
डूबी हुई नाकाम नब्जों को जिंदा रखने की कोशिश है कोई,
या दर्द में पिघलते जिस्मों का कोई मजमा है ,
वो गली जिसमें कभी ,
अंजुलि भर ख़ुशी समेटने की ख्वाइश लिए गए थे हम,
वो गली आज हमारे आखिरी लम्हों का ठिकाना है कोई.....!

Tuesday, October 8, 2013

खामोशी



मेहंदी का रंग अभी उतरा न था,
दर्द जिस्म से अभी पिघला न था,
खाब आँखों में थे....सो तैरते रहे,
नब्ज़ धड़कन की बस बुझने सी लगी,
हुआ तो कुछ भी नहीं पर बस यही हुआ,
दिल और हम..........खामोश हो गए