Thursday, February 20, 2014

क्या प्यार वक़्त के साथ मुरझा जाता है?

वो दोनों एक ही बेंच के दो किनारों पर बैठे अलग अलग दिशा में तक रहे थे, और सोच रहे थे कि पहल कौन करेगा! चुप्पी कौन तोड़ेगा? बैठे बैठे कितने मिनट कितने घंटे गुज़र गए कुछ पता ही न चला, यादों ने कब इंतज़ार की जगह ले ली पता ही न चला...पूरे पंद्रह साल पहले, शादी की पहली रात...जिस रात का इंतज़ार दोनों पूरे एक साल से कर रहे थे, बेसब्र थे, बेचैन थे, वो रात आई थी, दोनों खुश थे बेहद, चंदर दबे पाँव कमरे में आया और उसने दरवाज़ा अन्दर से बंद कर दिया, और झट से निशा के गोद में सर रखकर लेट गया, “निशा आज कितना सुकून है न! न कोई डर न किसी की परवाह, आज हमें किसी की तीखी नज़रे नहीं झेलनी पड़ेंगी, आज कोई हमपर ऊँगली नहीं उठाएगा, सच...बेहद अच्छा लग रहा है” दोनों की ज़िन्दगी सुकून के साए में चलने लगी..

शादी की बुनियाद प्यार थी, पर ये प्यार ये रिश्ता कब बस एक रस्म में तब्दील हो गया, ये दोनों समझ ही न सके, वक़्त गुजरता गया, पर निशा के पाँव भारी न हुए, निशा और चंदर के बीच कब एक अदृश्य दिवार खड़ी हो गयी, वो समझ न सके, निशा की कोख का सूनापन, चंदर और निशा के तकदीर को सूना कर गया....चंदर अब भी निशा से बेहद प्यार करता था, पर जब कभी वो निशा के नजदीक आने की कोशिश करता, निशा उस से और भी ज्यादा दूर चली जाती...वजह.. न वो कभी चंदर को बताती न खुद के सामने दोहराती....चंदर का टूटना उसे तोड़े जा रहा था पर एक असहाय, कमज़ोर इंसान की तरह वो चुपचाप देखती रही, कुछ भी न कर सकी, शायद उसने खुद को समझा लिया था, कि चंदर की ख़ुशी एक मासूम बच्चे में है और वो उसे नहीं दे सकती” निशा घर के बंद कमरों, दीवारों और जाने किन किन से बातें करती...पर चंदर से कहने के लिए हमेशा शब्द की कमी रहती...चंदर को ऑफिस की तरफ से पूरे एक साल के लिए अमेरिका जाना पड़ा, चंदर के जाने के बाद निशा ने संगीत सिखाने का काम शुरू किया, बच्चे अमूमन पांच से दस साल के बीच के होते, यहाँ निशा का मन लगने लगा, कभी महसूस ही न होता के उसकी अपनी कोई औलाद नहीं, हर सुबह निशा को शाम का इंतज़ार रहता, जब वो मासूम बच्चे उसने संगीत सिखने आएँगे, उनकी खिलखिलाहट के उजालों ने निशा की ज़िन्दगी को नयी रौशनी से नवाज़ा था, उसने मन ही मन खुद से वादा किया था, कि जब चंदर लौटकर आएगा तो उसे ढेर सारा प्यार दूंगी......आज वो दिन भी आ गया, चंदर आज लौट आया, पर अपने साथ एक कागज़ का टुकड़ा भी लिए आया, उस कागज़ के हिसाब से चंदर को परमानेंटली अमेरिका शिफ्ट होना था, और उसने निशा से साथ चलने की बात की, निशा जिसने अपने जीवन को नया आयाम दिया था, जो इन दिनों खुशियों के बगिया में खिलखिला रही थी, उसके जैसे होश उड़ गए परमानेंटली शिफ्ट होने वाली बात सुन के, निशा ने बहुत देर तक मनाया चंदर को, पर चंदर न माना, चंदर चला गया, निशा को तनहा छोड़, निशा उसे समझा भी न सकी कि ये सारे बाग़, ये साड़ी कलियाँ उसने चंदर के लिए ही तो पिरोये हैं, कि उससे उसकी उदासी देखि न जाती थी, पर वो खामोश रही, वजह...आज भी न कह सकी..

निशा माजी के गहरे समंदर में डूबती जा रही थी, कि अचानक उसकी नज़र बेंच के दूसरे किनारे पर परी, जो अब खाली थी...चंदर उठकर जा चुका था....न उसने पूछा न कुछ कहा, बस उठकर चला गया....निशा बोझिल नजरों से चंदर को जाते हुए देखती रही, और बस यही सोचती रही....”क्या प्यार वक़्त के साथ मुरझा जाता है?”

कभी छोटी सी मुलाक़ात कितना सुकून दे जाती है,
और कभी लम्बी सी रात आँखों की नींद ले जाती है..
कभी खामोश बैठे जाने कितनी बातें हुआ करती थी,

आज शब्दों में एहसासों की कमी सी लगती है..

Tuesday, February 18, 2014

जो एकतरफा हो..वो प्यार नहीं होता

“प्यार कभी एकतरफा नहीं होता,
और जो एकतरफा हो..वो प्यार नहीं होता”

अब कुछ भी होता नहीं पहले की तरह,
न उम्मीद बंधती है, न पलती है, न टूटती ही है,
तेरे जाने से मेरे दिन रात सुलझ गए हैं,
उधरी थी जो ज़िन्दगी वो फिर से बुन ली है मैंने,
चंद लकीरें हाथों की मिटने लगी थी, उन्हें रंगीन मेहन्दी से महका दिया है,
चंद ख्वाब आँखों के खोने लगे थे, उन्हें फिर से नज़रों में सजा लिया है,
तेरे सितम, तेरे करम, तुझको हो मुबारक,
मैंने जीने की नयी राह पा ली है,
कि मुझे इश्क हुआ है पहली दफा.....ज़िन्दगी से....खुद से...

सुनो,
रिश्तों को बंधनों में ही रहने दो,
खुल गए तो बावरा बनाएंगे तुम्हे,
दिन रात की सुध भुलाएंगे,
अपने पीछे नचाएंगे तुम्हे,
अब तो घर के हो, कल बेघर बनाएंगे तुम्हे,
बंधनों को तोड़कर कौन आजतक आज़ाद हुआ,
खुद की सुध रही नहीं, बेवजह फसाद हुआ,
रिश्तों को बन्धनों में ही रहने दो,
खुल गए तो बावरा बनाएंगे तुम्हे.....