Friday, April 25, 2014

चंद अशआर

चंद रिश्तों के नाम नहीं हुआ करते,
उनके जुड़ने की पर चर्चा बहुत होती है..

मुझको मेरे घर का रस्ता बता ज़रा,
मैं खुद को शायद कहीं तुझमें भूल आई हूँ..

तुलना....

सुनो,
तुम मुझसे तुलना न करना,
अतुल्य हैं कई जीव इसी पृथ्वी पर....
इस सत्य को जानना ज़रूरी है, 
तुम्हारे परखने से, और मेरे हार मान लेने से,
मेरी हार नही है, 
मेरा जीवन नहीं तुम्हारी बनायी कसौटियों पर खड़ा उतरने के लिए,
कि मैं बनी हूँ इस पृथ्वी पर कुछ ऐसा करने के लिए जो अतुल्य है...
इसिलए तुम मुझसे तुलना न करना...

“बहुत हुआ रोना धोना.. अब हम मुस्कुराएंगे,
ज़िन्दगी गुजारते तो सब हैं...हम जीकर दिखाएंगे..”

बस यूँ ही.....

“वो एक-तरफ़ा थी याद,
या एक-तरफ़ा थी सोच,
वो एक-तरफ़ा था प्यार
या बेहद तनहा थे हम!”

चलो अच्छा हुआ जो तुमने भरम तोड़ दिया,
प्यार का और इरादों का क़सम तोड़ दिया,
नींद में चौंकते तो क्या होता,
जागती आँख में बसते थे जो ख्वाब तोड़ दिया,
गुज़रे लम्हों में सौंधी खुशबू सी जो मिलती रही,
जिनको दिन रात अपने गेसू में पिरोती रही,
वो जो एक सिलसिला था अपना उसे तोड़ दिया,
चलो अच्छा हुआ जो तुमने भरम तोड़ दिया,
प्यार का और इरादों का क़सम तोड़ दिया...

बस यूँ ही....

“ज़िन्दगी को समझने की कोशिशें ताउम्र हम करते रहे,
कभी ज़हरीला नाग और कभी सजा के नाम से पुकारते रहे,
जब मौत आई तो जाना ज़िन्दगी क्या है!”

ज़िन्दगी आसान है या मुश्किल. कैसे समझूँ मैं?
कैसे समझूँ कि अपनाया था जिन्हें अपने अपनों से बढ़कर,
बनाएं थे जो दिल के रिश्ते खून के रिश्तों से बढ़कर,
आज वही रिश्ते, मुझसे छूटें जाते हैं, 
दिल के बिखरे तारों के साथ आज ये बिखरे जाते हैं,
न सुकून है, न जुनू और न बची उम्मीद कोई,
फिर भी सब कहते हैं ‘कि समझो’ कहो कैसे समझूँ मैं??

Saturday, April 5, 2014

मेरी डायरी के पन्ने.........चंद ख्वाब

मेरा घर बहुत बड़ा था तब, मेरी उम्र बहुत छोटी थी जब, छोटे छोटे पैरों से आँगन में दौड़ती फिरती तब, जहां माँ सर पर आँचल लिए, साग चुना करती थी, उन दिनों मेरे घर में हमेशा हंसने की आवाजें आती, माँ, चाची, दादी, बुआ सब मिलकर आँगन में बैठे कभी अचार बनाती कभी पापड़ और कभी बड़े, मौसम जब गर्मियों का हो, तो अंगम रौशन रहता इनकी हंसी, और हम सब की चहकती आवाजों से, मेरे घर का एक भी शख्स ऐसा न था, जिसने मेरी माँ के हाथों के बुने स्वेटर न पहने हो, मुझे बाहर दोस्त बनाने की कभी ज़रुरत ही न पड़ी, छोटी चाची का बेटा मुझसे एक साल छोटा था, और काकी की दो बेटियाँ मुझसे एक और दो साल बड़ी, मेरे पास एक छोटी नन्ही गुडिया भी तो थी, जिसे माँ हॉस्पिटल से खरीद कर लायी थी, हाँ कई सालों तक तो मैं यही सोचती रही, फिर एक रोज़ बाबूजी ने बताया कि ये तुम्हारी छोटी बहन है, और इसके भी माँ बाबूजी हमदोनो ही हैं, बाबूजी की बात सुन पहली बार समझ में आया था के बड़ा होना किसे कहते हैं! उस रोज़ से गुडिया को नहलाने और तैयार करने की ज़िम्मेदारी मैंने उठा ली थी, उसके एक रोने से मुझे लगता कि क्या कर उसके चेहरे की हंसी वापस ले आऊं, उसका खिलखिलाता चेहरा मेरी ज़िन्दगी बन गया था, मुझे खुद की सुध न रहती एक उसकी हंसी के आगे मुझे कुछ न सूझता,  मुझे आज भी याद है माँ से चाची को कहते सूना था, ‘छोटी बहन के आने से तो अब बड़ी को अच्छा न लगता होगा? उसका प्यार जो बंट गया! तब माँ ने गर्व से कहा था, ना....मेरी अन्नू तो बस प्यार देना जानती है, पाने की तमन्ना इसने कभी की ही नहीं...” पर उस रोज़ मैं काफी देर तक यही सोचती रही, प्यार यदि सिर्फ दिया है मैंने, तो वो क्या था जिसे पाकर मैं इतनी खुश रहती हूँ....मुझसे ज्यादा देर इंतज़ार न हुआ. और जब बाबूजी आए तो मैंने झट से उनसे सवाल किया....मेरे सवाल सुन बाबूजी ने मुझे बहुत प्यार से अपनी गोद में बिठाया और जो कहा वो अब भी याद है मुझे “अन्नू, जो ख़ुशी देने में मिलती है वो पाने में कहाँ, तू इसीलिए खुश है, क्यूंकि तू देना सीख चुकी है, प्यार देना हमेशा और मेरी बिटिया बस तू ऐसी ही रहना.....”

बस यूँ ही...

गुज़रे लम्हों की तहरीर बनती रही,
खामोश सी मैं तस्वीर बनती रही,
धुंआ सा आँखों में दिन रात चुभता रहा,
उसके जाने से मैं और डूबती रही,
रात ख्वाबों में कटते रहे,
मैं बस इक तुझे सोचती रही,
नब्ज़ जब डूबने लगे मेरे,
तेरे होने की इक लकीर ढूंढती रही,
गुज़रे लम्हों की तहरीर बनती रही,

खामोश सी मैं तस्वीर बनती रही….