Monday, August 17, 2015

एक सवाल-आज़ाद देश से

हम मानते रहे ‘धरती’ को माँ, ‘भारत’ को माँ, नदियों को माँ,
पर ‘बहन’ का दर्जा शायद किसी को नहीं दिया!
तभी तो सड़क पर चलते हुए, आये दिन जूझती है हर बहन,
झेलती है इन रावणों को, जिनके चेहरे पर लिखा कुछ नहीं होता,
दो हाथ, दो पैर, दो आँखें और जुबां भी बस एक ही होती है,
पर इस जुबां से निकलते हैं ऐसे शब्द जो भेद देते हैं इन कानों को,
वो आँखें, वो दो आँखें.. जब देखती हैं इन बहनों को, छिल जाती है रूह
जिस्म के अन्दर बहुत अन्दर ठेस लगती है इस दिल को,
फिर सोचती हैं बहने कि क्यूँ लिया जन्म इस देश में! क्यूँ हुई पैदा इस धरती पर!
क्यूँ रोक नहीं पायी खुद को उस पल में, उस हर पल में जब बाबूजी बोला करते थे,
ये देश हमारा है बिटिया, हर पुरुष हर स्त्री की रक्षा के लिए जन्म लेता है,
भाई बहन का रिश्ता ‘राखी’ का मोहताज नहीं होता,
तू देखना एक रोज़ तू भी समझेगी, कि रिश्ते बस मानने से बनते हैं,
निभाने से निभते हैं, इस देश में कोई दूजा नहीं, सब अपने हैं....

बाबूजी उस उम्र में भी सच्चाइयों से अनिभिज्ञ थे, या मैंने इस उम्र में ही देख लिया असली चेहरा,
असली चेहरा इस देश का, इस आज़ाद देश के आज़ाद ख्यालों वाले पुरुषों का,
नहीं ये पुरुष किसी बड़े माँ बाप के बिगड़े बेटे नहीं, ये बेटे हैं किसी गरीब के, कोई गरीब जो मुश्किल से जोड़ता है रोटियाँ घर की, उनके बेटे सड़क पर चलते हुए कभी छेड़ते हैं किसी बच्ची को, कभी किसी महिला को तो कभी किसी बुज़ुर्ग को, कभी गालियों की वर्षा करते हैं, कभी मारते हैं कंकर और खुश होते हैं इन बहनों की तकलीफ में, बेहद अफ़सोस की बात है, जहां एक ओर हम यहाँ देश की आज़ादी की वर्षगाँठ मना रहे थे, वही दूसरी ओर ये लड़के जो आने वाले वक़्त में इस देश के भविष्य को लिखनेवाले हैं, वो लड़कियों को परेशान कर रहे थे, इन्हें मालूम है के इन्हें कोई कुछ नहीं करेगा, पुलिस वाले दो दिन के लिए जेल में डालेंगे फिर पैसे लेकर छोड़ देंगे, हमारे देश का क़ानून जो रोज़ हल्ला करता है कि इस देश में बेटियों के लिए कड़ी सुरक्षा के प्रबंध हैं, उस कानून से और इस समाज के ठेकेदारों से मेरा बस यही एक सवाल है कि ‘क्या वाकई में हम सुरक्षित हैं????’