Thursday, July 27, 2017

बस यूँही

जिन लकीरों पर तुम्हारा नाम लिखा था,
वो लकीरें अब घिसने लगी हैं,
ज़िन्दगी एक लम्बी उम्र तय कर,
जाने कहाँ पहोच गयी है,
तुम्हारा साथ एक सपना सा लगता है अब तो,
तुम्हारी याद, जैसे पिछले जनम से कोई आवाज़ देता हो,
क्या हम तुम वाकई एक दुसरे के लिए बने थे!

Thursday, July 13, 2017

तुम...और तुम्हारी मैं...

वो अपनी नज़रों से दुनिया देखना चाहता था..
मैं उसकी नज़रों से, 
वो चाँद, तारों का साथ चाहता था,
मैं.... उसका,
वो ज़िन्दगी की हक़ीक़तों से मुझे रु-ब-रु कराना चाहता था,
मैं जीवन भर उसके ख्वाब देखना चाहती थी,
वो मेरे साथ होकर भी मेरा न था,
मैं उस से दूर जाकर भी उसकी ही रही...

सटीक अपनी जगह पर,

सबकुछ कितना अजीब है न! एक ज़माने में जिससे दोस्ती थी, फिर प्यार हुआ..फिर नफ़रत ....
वो सब बदल कर आज सीर्फ ‘जान पहचान’ रह गयी है....
ये जान पहचान का रिश्ता कितना अजीब होता है न, 
न उम्मीदें होती हैं, न दर्द ...
न कोई डर किसी को खोने का, न कोई ख़ुशी किसी को पाने की..
रिश्ता न कमज़ोर होता है, न मजबूत ही....
पर फिर भी कुछ रह जाता है..
वही रह गया हमारे बीच भी, तुम भी बदल गए, और हम भी...
अब मुझे चोट लगे तो तुहारे मुह से आह नहीं निकलती, 
और तुम्हे दर्द हो तो मेरी नींदें नहीं उडती.....
सब ठीक है अब...सटीक अपनी जगह पर,...

Tuesday, July 4, 2017

बदला कुछ है शायद हमारे दरमियाँ .....

कितना अजीब वो पल होता है न ..
जब दिल में अनगिनत बातें भरी हो..और जुबां खामोश हो,
वो  पल कितना भारी होता है,
जब होंठ तो हिले, पर शब्द बेज़ुबान हो जाए,
आँखों में उम्मीदें हो, और कान सुनने को तरसते हो जिसकी आवाज़,
उसी से बात करते-करते, उसी की बात सुनते-सुनते,
बस अचानक ही लगे,
कि “अब कुछ मत कहो...शायद और सुन ना पाऊं...”
जिसे पाने की आरज़ू ताउम्र खुद में लिए फिरते हैं,
जिसकी सूरत, हर सूरत में तलाश करते हैं,
जिसकी खामोशी भी एक गूँज बनकर, कहीं कानों में बसा करती है,
उसी के साथ चलते चलते, कभी ऐसा भी होता है,
कि वो तो होता है...पर वो कहीं नहीं होता...